महाराष्ट्र में हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बनाने की सरकारी पहल ने मराठी भाषाई पहचान को चुनौती दी, जिससे शिवसेना‑एमएनएस के बीच असामान्य गठबंधन बना। यह संघर्ष 17वीं शताब्दी के शिवाजी के सुधारों से लेकर आज तक भाषा‑राजनीति की जटिल परतों को उजागर करता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मराठी भाषा की सुरक्षा 17वीं शताब्दी से चल रही है।
  • 2025 में हिंदी को तीसरी भाषा बनाने की नीति ने व्यापक विरोध को जन्म दिया।
  • भाषाई संघर्ष राज्य की फेडरल संरचना और शिक्षा नीति को पुनः परिभाषित कर रहा है।

अप्रैल‑जून 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी‑2020 के अनुरूप माराठी‑और‑अंग्रेजी‑मीडियम स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बनाने का आदेश जारी किया। यह कदम प्रशासनिक रूप से छोटा था, परन्तु राजनीतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील। आदेश के बाद मुंबई और पुणे की सड़कों पर शिवसेना (UBT) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ता एक साथ मार्च करने लगे, जिससे राज्य में भाषा‑आधारित विरोध का नया चरण शुरू हुआ। अंततः सरकार ने जून के अंत में इस आदेश को वापस ले लिया।

भाषा संघर्ष का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

१७वीं शताब्दी में दक्कन में फ़ारसी शासक वर्ग का प्रभाव था; मराठी‑भाषी जनता को फ़ारसी में कर व प्रशासनिक कार्य करना पड़ता था। शहाजी महाराज ने १६३० में ८६% फ़ारसी शब्दावली को घटाकर ३७% तक लाने हेतु राज्यव्यवहारकोश तैयार किया, जिससे प्रशासनिक शब्दों को मराठी या संस्कृत में बदल दिया गया। यह पहला बड़ा भाषाई पुनरुद्धार था, जिसने मराठी को राजकीय पहचान का मुख्य आधार बनाया।

उपनिवेशकालीन मोड़ और राष्ट्रीय आंदोलन

ज्योतीराव फुले की १८८२ की हंटर आयोग में दी गई रिपोर्ट ने शिक्षा में मराठी की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी वर्गों के लिए प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य करने और मराठी के दो लिपियों (मोदी व बालभोध) में पढ़ाने की मांग की। उसी समय १८८१ में केसरी (मराठी) और महारत्ता (अंग्रेज़ी) की स्थापना ने भाषा को जनवादी आंदोलन का साधन बना दिया। बाल गंगाधर टिलक, जो पहले हिन्दी के समर्थन में थे, ने १९०५ में वाराणसी में हिन्दी‑देवनागरी को राष्ट्रभाषा बनाने की पुकार की, परन्तु वह मराठी को महाराष्ट्र की मातृभाषा के रूप में बचाए रखने की भी वकालत करते रहे।

शुद्धिकरण और बहुलता का द्वंद्व

विनायक सावकर ने १९२६ में भाषा शुद्धिकरण परियोजना शुरू की, जिसमें अरबी‑फ़ारसी शब्दों को संस्कृत‑मूलक शब्दों से बदलना शामिल था। उन्होंने 'दूरदर्शन', 'आकाशवाणी', 'संसद' और 'हुतात्मा' जैसे शब्दों को पुनः प्रस्तुत किया, जो आज राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग होते हैं। सावकर ने १९४९ में संविधान सभा को भारत का नाम 'भारत', राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' और लिपि 'देवनागरी' अपनाने की सलाह दी, जबकि वह महाराष्ट्र में मराठी के कट्टर समर्थक भी थे। यह विरोधाभास आज भी भाषा‑राजनीति में परिलक्षित होता है।

आधुनिक राजनीतिक प्रभाव

तीन‑भाषा नीति के तहत हिंदी को अनिवार्य बनाने की कोशिश ने फेडरल संरचना और राज्य की स्वायत्तता पर प्रश्न उठाए। महाराष्ट्र में मातृभाषा शिक्षा के पक्ष में कई सामाजिक संगठनों ने न्यायालय में याचिकाएँ दायर कीं, जबकि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखकर समान शिक्षा नीति को लागू करने की कोशिश की। इस संघर्ष का परिणाम यह होगा कि भविष्य में भाषा‑आधारित राजनीति राज्य के विकास, सामाजिक सामंजस्य और शैक्षिक गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करेगी।