राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 1996 कश्मीर में हुए दंगे और पुलिस पर निरंकुश गोलीबारी में संलिप्त छह हुरियत नेताओं के खिलाफ चार्जशीट दायर की। आरोपों में आपराधिक षड्यंत्र, हत्या का प्रयास, दंगा और सार्वजनिक सेवकों पर हमला शामिल हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • नए साक्ष्य के आधार पर NIA ने छह हुरियत नेताओं को 1996 कश्मीर दंगे के लिए आरोपित किया।
  • तीन मृत नेताओं के खिलाफ भी आरोप स्थापित हुए, जबकि उनके खिलाफ़ अब कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।
  • जांच में बताया गया कि दंगे को एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा माना गया था, जिसका उद्देश्य भारत के खिलाफ़ अलगाववादी भावना को भड़ाना था।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने शुक्रवार, 10 जुलाई 2026 को एक विस्तृत चार्जशीट दायर की, जिसमें छह वरिष्ठ हुरियत कॉन्फ़्रेंस नेताओं को 1996 कश्मीर दंगे की जिम्मेदारी दी गई है। इस दंगे में पुलिस कर्मियों पर निरंकुश गोलीबारी और व्यापक पत्थरबारी हुई थी, जिससे कई अधिकारी घायल हुए।

पृष्ठभूमि

1996 के जुलाई में, श्री हिलाल अहमद बेइग की अंतिम संस्कार यात्रा के दौरान कश्मीर के नाज़ क्रॉसिंग पर एक जुलूस आयोजित किया गया था। इस जुलूस में कई उग्रवादी समूहों ने घुसकर पुलिस पर गोलियां चलाईं और बड़े पैमाने पर दंगा भड़काया। यह घटना उस समय के जम्मू‑कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता का एक प्रमुख चिन्ह बन गई।

जांच का विवरण

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर अप्रैल 2026 में NIA ने इस मामले की जांच संभाली। एजेंसी ने पुष्टि की कि शबीर अहमद शाह, सैद अली शाह गीलानी, अब्दुल गनी लोन, जवेद अहमद मीर, शकील अहमद बख्शी और मोहम्मद याकूब वाकिल ने अनधिकृत सभा को प्रोत्साहित किया और हिंसक कार्यों को उकसाया।

जांच में यह भी उजागर किया गया कि आतंकवादी समूहों ने इस जुलूस में घुसकर पुलिस पर निरंकुश गोलीबारी की, जबकि हुरियत नेताओं ने राष्ट्रीयता-विरोधी, पाकिस्तान-समर्थक और अलगाववादी नारे लगे। इस प्रकार दंगा को एक बड़े, पूर्व-निर्धारित षड्यंत्र का हिस्सा बताया गया।

कानूनी पहलू

इन छह व्यक्तियों को 1989 के रैनबीर पेनल कोड के तहत आपराधिक षड्यंत्र, हत्या का प्रयास, दंगा और सार्वजनिक सेवकों पर हमला जैसे धारा में चार्ज किया गया है। साथ ही 1967 के अवैध कार्य (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13 के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। तीन मृत व्यक्तियों (गीलानी, लोन, वाकिल) के मामले में, एजेंसी ने उनके योगदान को स्थापित किया, परंतु अब उनके विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

राजनीतिक प्रभाव

यह चार्जशीट कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को गंभीर रूप से कमजोर करने की दिशा में एक प्रमुख कदम माना गया है। सरकार का यह कदम न केवल न्याय की माँग को पूरा करता है, बल्कि भविष्य में ऐसी हिंसा को रोकने के लिए सख्त संदेश भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कड़ी कार्रवाई से सार्वजनिक विश्वास में वृद्धि होगी और क्षेत्र में शांति प्रक्रिया को नई दिशा मिल सकती है।