बेंगलुरु के बाहरी हिस्से में प्रस्तावित बिदादि टाउनशिप परियोजना को अब किसान और ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती आवाज़ का सामना करना पड़ रहा है। भूमि अधिग्रहण को लेकर तनाव और राजनीतिक दलों के बीच तीव्र मुकाबला इस विकास योजना को जोखिम में डाल रहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बिदादि टाउनशिप परियोजना पर बढ़ता विरोध
- महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी
- राजनीतिक दलों के बीच तीव्र मुकाबला
बिदादि टाउनशिप योजना, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु के बढ़ते शहरी दबाव को कम करना और किसानों को औद्योगिक विकास से जोड़ना है, अब एक व्यापक सामाजिक और राजनैतिक बहस का केंद्र बन गई है। राज्य सरकार ने इसे आर्थिक विकास की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन भूमि अधिग्रहण के लिए तेज़ी से कदम उठाने से ग्रामीण वोटरों में नाखुशी पैदा हो रही है।
परियोजना की पृष्ठभूमि
कर्नाटक सरकार ने बिदादि के पास लगभग 1,200 एकड़ कृषि भूमि को टाउनशिप में बदलने की योजना बनाई थी। इस प्रस्ताव को शुरुआती चरण में मुख्यतः बड़े ज़मींदार और बीजेजे(एस) के समर्थकों ने विरोध किया, जबकि कांग्रेस ने इसे किसानों के कल्याण के लिए बताया। समय के साथ विरोध का दायरा विस्तृत हो गया, जिससे विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हो गए।
महिलाओं की भूमिका
पिछले सोमवार को हुए सर्वेक्षण में महिलाओं ने झाड़ू की लाठी लेकर अधिकारियों को रोकते हुए एक नई राजनीतिक तस्वीर पेश की। ग्रामीण घरों की आयुर्वेदिक रक्षा के रूप में महिलाओं को देखना, कांग्रेस को यह दावा करने से रोकता है कि यह केवल पार्टी‑संबंधी विरोध है। शुगरकेन किसानों ने भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर FIR रद्द करने की मांग की, यह दर्शाता है कि महिलाएँ ग्रामीण मतदाता वर्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री ईश्वर खंड्रे ने विरोध को “राजनीतिक प्रेरित” कहा, जबकि राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर ने कहा कि किसानों की सहमति के बिना कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। सार्वजनिक कार्य मंत्री सतीश जार्कीहाली ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को इस विवाद से अलग रखने की कोशिश की। वहीं बीजेजे और जे.डी.(एस) ने इस परियोजना को कांग्रेस की “किसानों के विरुद्ध” नीति का प्रमाण बताया।
कांग्रेस के भीतर मतभेद
कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद ने उर्वर कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर संकोच जताया। अगर विरोध तेज़ी से बढ़ता है, तो क्षेत्र के कई विधायक नेतृत्व से परियोजना की पुनः समीक्षा करने की मांग कर सकते हैं, जिससे पार्टी की विकास कथा को नुकसान पहुंच सकता है।
भविष्य की दिशा
सरकार दो विकल्पों के बीच फँसी हुई है: ज़ोरदार ज़मीनी अधिग्रहण से किसान और ग्रामीण वोटरों को खोना, या परियोजना को घटा कर विकास की कहानी को कमजोर करना। दोनों ही स्थिति में विरोधी दलों को जीतने का मौका मिल सकता है, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ सकती है। इस संघर्ष का परिणाम न केवल बिदादि के भविष्य को तय करेगा, बल्कि कर्नाटक में विकास और किसानों के अधिकारों के बीच संतुलन को भी परिभाषित करेगा।