जम्मू-कश्मीर की राज्यता के वादे को लेकर ओमर अब्दुल्ला की निराशा न्यायालय के 2023 के आदेश और 2024 के चुनावों से जुड़ी है। उनका ट्रम्प‑उल्लेख राजनीतिक चुटीला लग सकता है, परन्तु इसे अंतरराष्ट्रीयकरण के जटिल इतिहास के प्रकाश में देखना चाहिए।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने राज्यता का वादा दोहराया।
  • ओमर अब्दुल्ला का ट्रम्प‑उल्लेख राजनीतिक चुटीला है, परन्तु इसका ऐतिहासिक पहलू महत्वपूर्ण है।
  • अमेरिका एवं यूके की दशकों की जमीनी नीति जम्मू‑कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाना चाहती रही है।

2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण को मान्य करते हुए कहा कि “संसदीय सभा में केंद्र की प्रतिबद्धता के अनुसार, जम्मू‑कश्मीर की राज्यता निकट भविष्य में चुनावों के बाद बहाल की जाएगी”। यह बयान केंद्र सरकार की 2019‑के बाद की प्रतिबद्धता को कानूनी शक्ति प्रदान करता है और राज्यता के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श में पुनः स्थापित करता है।

पृष्ठभूमि और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

2024 के शांतिपूर्ण विधानसभा चुनावों में उच्च मतदान दर ने जनता का लोकतांत्रिक संस्थानों में भरोसा दर्शाया। यह मतदारी, लंबे समय से चल रहे राजनीतिक ठहराव को तोड़ते हुए, “नया कश्मीर” के पुनरुद्धार का प्रतीक बन गई। इस माहौल में जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने राज्यता के वादे में देरी को लेकर अपनी निराशा व्यक्त की, जो कि न्यायालय के आदेश और जनता की आशाओं के साथ सामंजस्य रखती है।

ओमर अब्दुल्ला का ट्रम्प‑उल्लेख: चुटीला या रणनीतिक?

सिर्फ़ शनिवार को श्रीनगर में राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “बीजेपी हमें बता दे कि क्या हमें राज्यता के लिये (अमेरिका के राष्ट्रपति) ट्रम्प के पास जाना पड़ेगा और व्हाइट हाउस के बाहर धरना देना पड़ेगा।” यह टिप्पणी कई लोगों ने “राजनीतिक क्लिकबेट” कहा, परन्तु इसका इतिहास‑संबंधी आयाम अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अंतरराष्ट्रीयकरण का इतिहास

1948 में ट्रूमैन प्रशासन ने भारत‑पाकिस्तान के संयुक्त आयोग (UNCIP) की स्थापना का समर्थन किया, जबकि शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी अधिकारी पाकिस्तान‑कब्ज़े वाले क्षेत्रों में भारतीय सेना की सहायता करते रहे। 1990 के दशक में अमेरिकी विदेश विभाग के कर्मचारियों, जैसे रॉबिन राफेल, ने अलगाववादी प्रवृत्तियों को सूक्ष्म रूप से समर्थन दिया। इस दशकों‑भरे इतिहास ने जम्मू‑कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने की कोशिश की, अक्सर भारत की राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ कार्य किया।

भविष्य की दिशा

ओमर अब्दुल्ला ने पिछले दो वर्षों में कश्मीर में नई राजनीतिक भाषा तैयार की है, जो राज्यता की मांग को मुख्यधारा में रखती है। इस मांग को टाल‑मटोल वाले बयान या विदेशी हस्तक्षेप के संकेतों से धुंधला नहीं होना चाहिए। यदि केंद्र इस वादे को पूरा करता है, तो यह न केवल क्षेत्रीय स्थिरता बल्कि भारत‑पाकिस्तान शांति प्रक्रिया में भी सकारात्मक योगदान देगा।