पुडुचेरी में विभिन्न संगठनों ने स्थानीय निकाय चुनावों की देर को लेकर चुनाव विभाग के सामने प्रदर्शन किया। अदालत के निर्देश के बावजूद सरकार द्वारा चुनाव न कराने पर विरोध के स्वर तेज़ हो गए।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पुडुचेरी में स्थानीय निकाय चुनावों में 20 साल से अधिक का अंतराल
- एआईएनआरसी‑बीजेपी सरकार पर अदालत के आदेश को न मानने का आरोप
- ओबीसी आरक्षण के बाद भी चुनाव स्थगित, नई आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत
पुडुचेरी में 14 जुलाई को चुनाव विभाग के मुख्यालय के सामने कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रदर्शनों का आयोजन किया, ताकि हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में देरी को लेकर सरकार को जवाबदेह ठहराया जा सके। प्रदर्शनकारियों ने एआईएनआरसी‑बीजेपी गठबंधन सरकार के विरुद्ध चिल्लाते हुए कहा कि अदालत के आदेश के बाद भी चुनाव नहीं करवाए जा रहे हैं।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
पुडुचेरी ने पिछले 58 वर्षों में केवल एक बार 2006 में स्थानीय निकाय चुनाव करवाए थे। 2021 में राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव आयोजित करने की तैयारी शुरू की, परंतु मदरास हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद के कारण इसे स्थगित कर दिया। इस फैसले के बाद सरकार ने 17 दिसंबर 2021 को पूर्व हाई कोर्ट जज के.के. सासिधरन को एक व्यक्ति आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया, ताकि ओबीसी आरक्षण के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा सके।
आयोग की रिपोर्ट और वर्तमान स्थिति
कमीशन ने मार्च में मारिए बिल्डिंग में आयोजित एक समारोह में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें ओबीसी वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण और चुनाव शेड्यूल का प्रस्ताव शामिल था। हालांकि, सरकार ने अभी तक इस रिपोर्ट के आधार पर चुनाव की तारीखें घोषित नहीं की हैं, जिससे नागरिक समाज और राजनीतिक नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है।
प्रमुख आवाज़ें और भविष्य की संभावनाएँ
पूर्व सांसद और पुडुचेरी मानिला मकल मुनेत्रा कज़हग के अध्यक्ष एम. रामदास ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा, "जनता का अधिकार है कि वह अपने प्रतिनिधियों को समय पर चुन सके। न्यायालय के आदेश का उल्लंघन लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है।" उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह जल्द से जल्द चुनाव शेड्यूल जारी करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस मुद्दे को अनदेखा करती रही तो सामाजिक अशांति और राजनीतिक दबाव में वृद्धि हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थानीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में देरी को अक्सर मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखा जाता है, जिससे पुडुचेरी की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।