मुख्यमंत्री डी.के. शिवाकुमार ने बिदाड़ी टाउनशिप परियोजना को अपनी कल्पना नहीं बताया और कहा कि यह 2006 की गठबंधन सरकार की पहल है। उन्होंने ज़मीन अधिग्रहण को जबरदस्ती नहीं, बल्कि स्वैच्छिक आधार पर करने का आश्वासन दिया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बिदाड़ी टाउनशिप परियोजना 2006 की गठबंधन सरकार की पहल है।
  • वर्तमान कांग्रेस सरकार इसे निजी भागीदारी के बजाय सरकारी मॉडल में विकसित करेगी।
  • किसानों को स्वैच्छिक रूप से भूमि बेचने पर ही मुआवजा दिया जाएगा, जबरन अधिग्रहण नहीं होगा।

बेंगलुरु के मुख्य मंत्री डी.के. शिवाकुमार ने बुधवार को बिदाड़ी टाउनशिप परियोजना को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह उनका "ड्रीम प्रोजेक्ट" नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल की जड़ें 23 सितम्बर 2006 को हुए एक बैठक में तब के मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी द्वारा रखी गई थी, जब पाँच एकीकृत टाउनशिप्स की मंजूरी दी गई थी।

पिछला इतिहास और सरकारी दृष्टिकोण

शिवाकुमार ने बताया कि 2006 में गठबंधन सरकार ने सार्वजनिक‑निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत वैश्विक टेंडर आमंत्रित करने का निर्णय लिया था। 2007 में मारंदहाली और ओडयरहली जैसे गांवों को भी प्रस्तावित टाउनशिप सीमा में शामिल किया गया। 20 नवम्बर 2006 को जारी गेजेट नोटिफिकेशन ने इस क्षेत्र को "रेड ज़ोन" घोषित किया, जिससे बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी निर्माण संभव नहीं था।

वर्तमान सरकार की प्रतिबद्धताएँ

शिवाकुमार ने स्पष्ट किया कि नई कांग्रेस सरकार इस परियोजना को निजी डेवेलपर की बजाय राज्य के सीधा नियंत्रण में विकसित करेगी। उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण के लिए कोई जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी; केवल उन किसानों को ही मुआवजा मिलेगा जो स्वेच्छा से अपनी जमीन बेचेंगे। जो किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते, उन्हें खेती जारी रखने की पूरी स्वतंत्रता होगी।

राजनीतिक विवाद और सामाजिक तनाव

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले सरकार के समय में किसानों के विरोध को राजनीतिक उकसावे ने बढ़ावा दिया था, और बिदाड़ी में भूमि सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा से उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने कुछ राजनीतिक हस्तियों पर किसानों को भ्रामक जानकारी देने का आरोप लगाया और खुद को "किसान का पुत्र" कहकर किसानों के संघर्ष को समझने का दावा किया।

भविष्य की राह

शिवाकुमार ने यह भी बताया कि बी.एस. येडियुरप्पा के शासनकाल में 2010 में इस प्रस्ताव को फिर से उठाया गया था, लेकिन अब सरकार का लक्ष्य इसे पारदर्शी, सार्वजनिक हित में और बिना किसी जबरन अधिग्रहण के पूरा करना है। उन्होंने सभी विरोधी समूहों से आग्रह किया कि वे शांति बनाए रखें और विकास के लिए सहयोग दें।