संसद की संयुक्त समिति ने आंध्र प्रदेश सरकार की आपत्तियों के चलते 17 जुलाई निर्धारित बैठक को 20 जुलाई तक स्थगित कर दिया। विधेयक में विश्वविद्यालयों के नियमन को एक ही शीर्ष निकाय में बदलने का प्रस्ताव है, जिससे राज्य के शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता को खतरा माना गया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • विकसित भारत शिक्षा संस्थान (VBSA) बिल में UGC, AICTE, NCTE को एकल निकाय में मिलाने का प्रस्ताव है।
  • आंध्र प्रदेश ने राज्य विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को खतरे में डालने वाले प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई।
  • समिति ने अंतिम बैठक को 20 जुलाई तक टाल दिया, जिससे विधेयक पर पुनः समीक्षा होगी।

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में व्यापक बदलाव लाने हेतु प्रस्तुत विकसित भारत शिक्षा संस्थान (VBSA) बिल, 2025 को संसद की संयुक्त समिति ने 17 जुलाई के नियोजित अंतिम सत्र को 20 जुलाई तक स्थगित कर दिया। यह कदम आंध्र प्रदेश सरकार की तीव्र आपत्तियों के बाद आया, जो तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व में है और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में भाजपा का सहयोगी भी है।

बिल का मुख्य उद्देश्य

बिल का प्रमुख प्रावधान मौजूदा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) को समाप्त कर, एक एकीकृत नियामक निकाय – विकसित भारत शिक्षा संस्थान (VBSA) – स्थापित करना है। यह निकाय सभी विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों के मानक, मान्यताएँ और वित्तीय अनुशासन को नियंत्रित करेगा। सरकार का तर्क है कि इससे दोहराव समाप्त होगा, नियामक प्रक्रिया तेज़ होगी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जा सकेगी।

आंध्र प्रदेश की आपत्तियों का आधार

आंध्र प्रदेश सरकार ने कहा कि यह विधेयक राज्य के शैक्षणिक संस्थानों की विधायी शक्ति को “मृत पत्र” बना देगा। विशेष रूप से धारा 11 को लेकर चिंता व्यक्त की गई, जिसमें नियामक परिषद को राज्य विश्वविद्यालयों को छोड़कर सीधे डिग्री प्रदान करने की अनुमति दी गई है। राज्य सरकार ने यह भी जोड़ा कि इस प्रावधान से संविधानिक तनाव उत्पन्न हो सकता है और राज्य की स्वायत्तता को गंभीर खतरा हो सकता है। इसके अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश ने एक अतिरिक्त क्लॉज की मांग की, जिसमें केंद्र को राज्य संस्थानों के संचालन में हस्तक्षेप करने से रोका जाए, और किसी भी कार्रवाई से पहले अनिवार्य परामर्श की व्यवस्था की जाए।

राजनीतिक परिदृश्य और संवाद

संघ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस विषय पर एक अनौपचारिक बैठक का आयोजन किया, जिसमें समिति की अध्यक्ष, भाजपा सांसद डी. पुरंदेश्वरी और कुछ अन्य सदस्यों ने भाग लिया। बैठक के दौरान TDP ने अपनी चिंताओं को स्पष्ट किया, जिससे समिति ने रिपोर्ट की पुनः समीक्षा का निर्णय लिया। यह प्रक्रिया पहले वाक़फ़ बिल और 130वें संविधान संशोधन बिल के दौरान भी देखी गई थी, जहाँ केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई थी।

भविष्य के प्रभाव और संभावनाएँ

यदि इस विधेयक को बिना संशोधनों के पारित किया गया, तो यह भारत के उच्च शिक्षा परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लाएगा। लेकिन साथ ही, यह संघ-राज्य संबंधों में नई चुनौतियों को भी उत्पन्न कर सकता है। राज्य विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र को संवैधानिक प्रावधानों का पुनः मूल्यांकन करना पड़ेगा, और संभाविततः नई परामर्शीय प्रक्रियाओं को स्थापित करना पड़ेगा। इस संदर्भ में, संसद के मोनसून सत्र में इस मुद्दे पर व्यापक बहस की संभावना है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राज्य-केन्द्र सहयोग के भविष्य को तय कर सकती है।