बजट 2024 के बाद भी भाजपा ने लोकसभा में बहुमत नहीं पाया, लेकिन पश्चिम बंगाल में दो-तिहाई सीटों की बाय-इलेक्शन से वह राजसभा में साधारण बहुमत के निकट पहुंच रही है। यह बदलाव मोनसन सत्र में विधायी एजेंडा को कैसे प्रभावित करेगा, इसका विश्लेषण इस रिपोर्ट में।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बजट 2024 के बाद भाजपा ने लोकसभा में बहुमत नहीं पाया, पर राजसभा में साधारण बहुमत के करीब है।
- पश्चिम बंगाल में 24 जुलाई को होने वाली बाय‑इलेक्शन से भाजपा को तीन सीटें मिलने की उम्मीद।
- न्यायिक संशोधन बिलों के लिये दो‑तिहाई समर्थन की आवश्यकता है, जिसका संतुलन गठबंधन की रणनीति पर निर्भर करेगा।
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब राजसभा में वह अंक हासिल करने के कगार पर है, जो 1986 के बाद किसी भी एकल दल के पास नहीं रहा। उस वर्ष कांग्रेस ने राजीव गांधी के नेतृत्व में साधारण बहुमत हासिल किया था, पर तब से कोई भी पार्टी अकेले इस स्तर तक नहीं पहुंच पाई। 2024 के आम चुनाव में भाजपा ने लोकसभा में बहुमत नहीं हासिल किया, फिर भी वह राजसभा में लगभग 123 के साधारण बहुमत के निकट पहुंच रही है।
पश्चिम बंगाल की बाय‑इलेक्शन और संभावित जीत
राजसभा में यह बदलाव मुख्यतः पश्चिम बंगाल में 24 जुलाई को निर्धारित तीन बाय‑इलेक्शन से आएगा। राज्य में भाजपा ने पहले ही विधानसभा में पर्याप्त संख्या हासिल कर ली है, जिससे वह इन तीन सीटों को आसानी से जीतने की स्थिति में है। तीन ट्राइणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व सांसदों ने अपने पद छोड़कर भाजपा में शामिल हो जाने के बाद ये रिक्तियां उत्पन्न हुईं। यदि भाजपा सभी तीन सीटों में जीतती है, तो उसकी कुल संख्या साधारण बहुमत से मात्र छः सीटों की दूरी तक घट जाएगी।
इंडिया के इतिहास में तुलना
राजसभा में साधारण बहुमत के लिए 123 सदस्य आवश्यक होते हैं। 1986 में कांग्रेस ने यह आंकड़ा अकेले हासिल किया था, लेकिन तब से इस लक्ष्य को कोई भी पार्टी अकेले नहीं छू पाई। वर्तमान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कुल 152 सदस्य हैं, जो राजसभा में एक मजबूत बहुमत प्रदान करता है, पर यह बहुमत केवल गठबंधन के स्तर पर है, न कि भाजपा के अकेले।
मोनसन सत्र और विधायी प्रभाव
राजसभा में बढ़ती संख्या के साथ, एनडीए को आगामी मोनसन सत्र में संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित करने में अधिक सुविधा होगी। सीमांकन और महिला आरक्षण बिल जैसे प्रमुख प्रस्ताव इस सत्र में चर्चा का केंद्र बनेंगे। दो‑तिहाई बहुमत (166 सदस्य) के बिना संवैधानिक बदलाव संभव नहीं हैं, इसलिए गठबंधन को क्षेत्रीय दलों के समर्थन या वोटों में वैकल्पिक रणनीति अपनानी पड़ेगी।
क्षेत्रीय दलों की भूमिका
ड्रविड़ मुन्नत्र काज़हगम (डीएमके), यशवंत राजेंद्र (वाईएसआर कांग्रेस), बिजु जनता दल (बजड) और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) जैसे छोटे दलों के समर्थन या निरंकुशता का असर इस समीकरण में महत्वपूर्ण होगा। इन दलों के सांसद या स्वतंत्र सदस्य, जैसे पारिमल नाथवानी, अक्सर गठबंधन के पक्ष में वोट देते हैं, जिससे दो‑तीहाई की सीमा को पार करने में मदद मिल सकती है।
सारांश में, भाजपा के लिए राजसभा में साधारण बहुमत के निकट पहुंचना एक रणनीतिक जीत है, जो मोनसन सत्र में विधायी एजेंडा को आकार देगा और भविष्य के चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करेगा।