विदुथलाई चिरुतिगल कत्ची (VCK) के महासचिव और विलुपुरम सांसद डी. रविकुमार ने संसद में जनगणना और आधिकारिक दस्तावेजों में अपमानजनक जाति नामों के उपयोग को समाप्त करने की मांग की है।
मुख्य बातें
- सांसद डी. रविकुमार ने जनगणना में अपमानजनक जाति नामों के उपयोग को समाप्त करने का आग्रह किया।
- उन्होंने कहा कि ऐसे शब्दों का उपयोग समुदायों को 'अमानवीय' बनाता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ में 1922 के मद्रास प्रेसीडेंसी के आदेश का उल्लेख किया गया।
- SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपमानजनक शब्दों का उपयोग अपराध है।
विदुथलाई चिरुतिगल कत्ची (VCK) के महासचिव और विलुपुरम से सांसद डी. रविकुमार ने शुक्रवार को संसद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि रजिस्ट्रार जनरल और भारत के जनगणना आयुक्त को जनगणना और आधिकारिक दस्तावेजों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों को जारी किए जाने वाले जाति प्रमाण पत्रों में अपमानजनक जाति नामों के उपयोग को तुरंत बंद करने का निर्देश दिया जाए।
नियम 377 के तहत अपना मामला रखते हुए, श्री रविकुमार ने तर्क दिया कि अनुसूचित जाति समुदायों के सदस्य लंबे समय से आधिकारिक दस्तावेजों में ऐसे अपमानजनक शब्दों के निरंतर उपयोग का विरोध करते रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन शब्दों का उपयोग पूरे समुदायों को 'अमानवीय' (dehumanises) बनाता है और उन्हें सामाजिक रूप से कलंकित करता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आधिकारिक दस्तावेजों में अपमानजनक शब्दावली का उपयोग न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह राज्य द्वारा दी गई पहचान के साथ विरोधाभास भी है। यदि कानून अपमानजनक शब्दों के उपयोग को अपराध मानता है, तो सरकार को स्वयं इन शब्दों को आधिकारिक रिकॉर्ड में जगह नहीं देनी चाहिए।
जातिगत पहचान के नाम पर अपमानजनक शब्दावली का उपयोग सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है जिसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है।
सांसद ने ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार की शब्दावली के खिलाफ आंदोलन 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुआ था। इसके जवाब में, 25 मार्च 1922 को मद्रास प्रेसीडेंसी की जस्टिस पार्टी सरकार ने एक सरकारी आदेश (G.O. No. 817) जारी किया था, जिसमें तमिल जिलों के आधिकारिक रिकॉर्ड में 'पराईयन' और 'पंचमान' जैसे अपमानजनक शब्दों के स्थान पर जाति-तटस्थ शब्द 'आदि द्रविड़र' के उपयोग का निर्देश दिया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में जातिगत पहचान के साथ जुड़े अपमानजनक शब्दों के खिलाफ लड़ाई दशकों पुरानी है। मद्रास प्रेसीडेंसी के ऐतिहासिक निर्णयों ने यह स्थापित किया था कि प्रशासन को सम्मानजनक भाषा का उपयोग करना चाहिए ताकि समुदायों की गरिमा बनी रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सांसद ने क्या मांग की है?
सांसद ने जनगणना और जाति प्रमाण पत्रों में अपमानजनक जाति नामों के उपयोग को समाप्त करने की मांग की है।
2. अपमानजनक शब्दों का उपयोग करना क्या अपराध है?
हाँ, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत किसी भी अनुसूचित जाति के सदस्य को अपमानित करने के इरादे से ऐसे शब्दों का उपयोग करना एक दंडनीय अपराध है।