कर्नाटक की नई कैबिनेट में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का शून्य होना राज्य की राजनीति में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। सत्ता के गलियारों में जाति और क्षेत्र के लिए संघर्ष जारी है, लेकिन महिला नेतृत्व को दरकिनार कर दिया गया है।
मुख्य बातें
- कर्नाटक की 33 सदस्यीय कैबिनेट में महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
- मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि महिला मंत्री की नियुक्ति में 'कोई तात्कालिकता' नहीं है।
- कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर महिला आरक्षण की वकालत की है, लेकिन राज्य में स्थिति विपरीत है।
- महिला मतदाता संख्या में पुरुषों से अधिक होने के बावजूद सत्ता में भागीदारी नगण्य है।
कर्नाटक विधानसभा का मानसून सत्र एक ऐतिहासिक और शर्मनाक स्थिति के साथ शुरू हो रहा है: एक ऐसी कैबिनेट जिसमें महिलाओं का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक नहीं है। पिछले दो हफ्तों से कैबिनेट विस्तार और पोर्टफोलियो आवंटन को लेकर राजनीतिक खींचतान जारी है, जहाँ मुख्य ध्यान जातिगत और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर केंद्रित रहा है।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दिल्ली में हाईकमान से परामर्श किया और उन 'शक्तिशाली' नेताओं को शांत करने में ऊर्जा खर्च की जो कैबिनेट में जगह न मिलने या महत्वपूर्ण विभागों से वंचित रहने पर नाराज हैं। हालांकि, महिलाओं के प्रतिनिधित्व को एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में नहीं देखा गया। जब मीडिया ने पूछा कि 33 सदस्यीय कैबिनेट में एक भी महिला क्यों नहीं है, तो मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि इस मामले में "कोई तात्कालिकता" नहीं है।
यह क्यों मायने रखता है
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर 33% महिला आरक्षण की पुरजोर वकालत की है, और राज्य में 'गृह लक्ष्मी' और 'शक्ति' जैसी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को लुभाया है। लेकिन जब वास्तविक सत्ता साझा करने की बात आती है, तो महिलाएं अंतिम प्राथमिकता बन जाती हैं।
एक पूरी तरह से पुरुष प्रधान कैबिनेट केवल एक चूक नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक विकल्प है जो दर्शाता है कि सत्ता के प्रयोग में महिला नेतृत्व को गौण माना जाता है।
इतिहास गवाह है कि कर्नाटक में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व हमेशा से बेहद कम रहा है। 2023 के विधानसभा चुनावों में, केवल 4.5% महिला विधायक ही निर्वाचित हुईं। स्थानीय निकायों में 50% आरक्षण देने वाले अग्रणी राज्य के रूप में, राज्य की यह स्थिति विरोधाभासी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कर्नाटक में महिला प्रतिनिधित्व का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1962 में महिला प्रतिनिधित्व अपने उच्चतम स्तर (8.65%) पर था, लेकिन उसके बाद से इसमें गिरावट आई है। अक्सर महिलाओं को केवल 'हल्के' विभाग जैसे महिला एवं बाल विकास या संस्कृति दिए जाते हैं, जो वास्तविक शक्ति के बजाय केवल प्रतीकात्मक होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कर्नाटक कैबिनेट में महिलाओं की स्थिति क्या है?
वर्तमान में 33 सदस्यीय कैबिनेट में महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, हालांकि एक पद खाली छोड़ा गया है।
2. कांग्रेस की महिला केंद्रित योजनाएं क्या हैं?
गृह लक्ष्मी योजना (₹2,000 मासिक) और शक्ति योजना (मुफ्त बस यात्रा) प्रमुख हैं।