श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट के पहले CEO के चयन में राम के प्रति श्रद्धा को प्राथमिक मानदंड बताया गया। खोज समिति के सदस्य सुरेश हवारे ने कहा, सार्वजनिक विश्वास को पुनः स्थापित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने अपने पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति के लिए एक खोज समिति गठित की है। इस समिति के एक सदस्य, पूर्व परमाणु वैज्ञानिक सुरेश हवारे ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवार में सबसे महत्वपूर्ण गुण "राम के प्रति श्रद्धा का भाव" होना चाहिए।

सुरेश हवारे का प्रोफ़ाइल

27 साल तक भारत परमाणु ऊर्जा विभाग में कार्य करने के बाद, हवारे ने शिरडी के श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट का नेतृत्व किया और वर्तमान में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) रायपुर के चेयरमैन तथा श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड के सदस्य हैं। उनका पुस्तक "Temple Management" भी इस क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता को प्रमाणित करता है।

विश्वास पुनर्स्थापना की चुनौती

हवारे ने कहा, "एक बार सार्वजनिक भरोसा टूट जाता है तो उसे पुनः बनाना कई वर्षों का काम है। इसलिए हमें पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह प्रबंधन प्रणाली स्थापित करनी होगी।" उन्होंने इस काम को तिरुपति, शिरडी जैसे बड़े तीर्थस्थलों से भी अधिक जटिल बताया।

अयोध्या का विशेष प्रशासनिक मॉडल क्यों?

अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं, जबकि तिरुपति में यह संख्या एक लाख से डेढ़ लाख के बीच रहती है। इसके अलावा, अयोध्या का मंदिर 500 साल से अधिक के संघर्ष का प्रतीक है, जिससे यह राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बन गया है। इस कारण प्रशासनिक ढाँचा भी अन्य मंदिरों से अलग होना चाहिए।

CEO की जिम्मेदारियाँ और अपेक्षित कौशल

नए CEO को भीड़ प्रबंधन, आपदा तैयारी, सामग्री प्रबंधन, मानव संसाधन और सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय प्रबंधन में निपुण होना आवश्यक है। हवारे ने बताया कि केवल धन को खाते में रखना पर्याप्त नहीं, उसे सामाजिक कार्यों में निवेश करना चाहिए। साथ ही, आधुनिक प्रौद्योगिकी, एआई और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग भी अनिवार्य माना गया।

चयन प्रक्रिया का खाका

खोज समिति लगभग दस व्यापक मानदंड तय करेगी, जिसके बाद ऑनलाइन और व्यक्तिगत साक्षात्कार आयोजित किए जाएंगे। अंत में योग्य उम्मीदवारों की सूची बनाकर ट्रस्ट को प्रस्तुत की जाएगी। हवारे ने इस प्रक्रिया को "युद्ध मोड" में चलाने की जरूरत पर ज़ोर दिया, क्योंकि यह करोड़ों लोगों के विश्वास का मामला है।

समाज की अपेक्षा है कि सभी दान पारदर्शी रूप से उपयोग किए जाएँ, जिससे मंदिर सामाजिक सेवाओं जैसे अस्पताल, विद्यालय, वृद्धाश्रम आदि में योगदान दे सके। इस दिशा में सही CEO का चयन ही भविष्य में भरोसे को पुनर्स्थापित करने की कुंजी होगा।