आईआईटी बॉम्बे के स्नातक और एआई उद्यमी रिशभ अग्रवाल ने मेटा के लगभग $1 मिलियन मूल्य के प्रस्ताव को नकार दिया। उन्होंने पाँच महीने के कार्यकाल के बाद अपना खुद का कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्टार्टअप शुरू करने का निर्णय लिया, जो भारतीय तकनीकी परिदृश्य में नई प्रवृत्ति को उजागर करता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • रिशभ अग्रवाल ने मेटा के ₹9.5 करोड़ के ऑफ़र को ठुकराया
  • वह अपना एआई स्टार्टअप लॉन्च करने के लिए जोखिम ले रहे हैं
  • यह निर्णय भारतीय डीप‑टेक इकोसिस्टम में उद्यमिता के बढ़ते रुझान को दर्शाता है

आईआईटी बॉम्बे के स्नातक और एआई विशेषज्ञ रिशभ अग्रवाल ने हाल ही में मेटा द्वारा प्रस्तुत एक मिलियन‑डॉलर (लगभग ₹9.5 करोड़) के आकर्षक पैकेज को नकार दिया। पाँच महीने के कार्यकाल के बाद, उन्होंने अपने X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर घोषणा की कि यह “एक कठिन निर्णय” था, लेकिन उन्होंने अपने स्वयं के एआई उद्यम को आगे बढ़ाने के लिये इस अवसर को त्याग दिया।

पेशेवर पृष्ठभूमि और शैक्षणिक उपलब्धियां

अग्रवाल ने जेईई में ऑल इंडिया रैंक 33 के साथ आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में स्नातक किया और एआई में पीएचडी की डिग्री हासिल की। उनका शोध “बियॉन्ड द स्टेटस क्वो इन डीप रिइन्फोर्समेंट लर्निंग” शीर्षक वाला था, जिसने उन्हें गूगल ब्रेन, डीपमाइंड और अंततः मेटा के सुपरइंटेलिजेंस लैब में वरिष्ठ शोधकर्ता बनायें। उन्होंने कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सर्वश्रेष्ठ पेपर पुरस्कार भी जीते हैं।

मेटा का प्रस्ताव और उसकी वास्तविक कीमत

रिपोर्टों में कहा गया था कि मेटा ने अग्रवाल को “एक मिलियन डॉलर से अधिक” का ऑफर दिया। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि वास्तविक प्रस्ताव रिपोर्ट की तुलना में “और भी अधिक” था, फिर भी उन्होंने इसे ठुकरा दिया। उनका तर्क सरल था—वित्तीय लाभ से अधिक, स्वतंत्र रूप से नई तकनीक को विकसित करने की स्वतंत्रता और जोखिम लेने की इच्छा ने उन्हें प्रेरित किया।

भारत में उद्यमिता का नया चरण

अग्रवाल का कदम भारतीय तकनीकी प्रतिभा के बीच एक बड़ी प्रवृत्ति को दर्शाता है: वैश्विक दिग्गजों के आकर्षक पैकेज को छोड़कर स्वयं के स्टार्टअप की राह चुनना। आईआईटी, आईआईएस और अन्य शीर्ष संस्थानों के स्नातक अब अधिकाधिक “रिस्क-टेक” क्षेत्रों—जैसे एआई, डीप टेक, बायोटेक—में अपना भविष्य देख रहे हैं। यह बदलाव न केवल व्यक्तिगत करियर पथ को बदल रहा है, बल्कि निवेशकों, नीति निर्माताओं और शैक्षणिक संस्थानों के लिए नई चुनौतियां और अवसर भी लेकर आया है।

भविष्य की संभावनाएं

यदि अग्रवाल का एआई स्टार्टअप सफल होता है, तो यह भारतीय एआई इकोसिस्टम को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना सकता है। साथ ही, यह उदाहरण अन्य युवा वैज्ञानिकों को भी समान जोखिम उठाने के लिये प्रेरित कर सकता है, जिससे “ड्रॉप‑आउट” की दर घटेगी और नवाचार की गति बढ़ेगी।