डॉ. रघुनाथ ए. मसेलकर ने कहा कि भारत को सस्ती, विश्व‑स्तरीय समाधान बनाने पर ध्यान देना चाहिए। मौजूदा सरकारी खरीद नीति जो सबसे कम बोली को प्राथमिकता देती है, वह नवाचार को रोक रही है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- डिप‑टेक और एआई को राष्ट्रीय विकास की प्रमुख धुरी बनाना
- सबसे कम बोली को नवाचार के ऊपर रखने की नीति को बदलना
- सार्वजनिक‑निजी साझेदारी में जोखिम‑साझेदारी को अपनाना
डॉ. रघुनाथ ए. मसेलकर, रॉयल सोसाइटी के फेलो और सीएसआईआर के पूर्व निदेशक, ने फिक्की लीजेंड्स सीरीज़ में बताया कि गहन‑प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और समावेशी तकनीक ही विकसित भारत की आधारशिला होंगी, बशर्ते देश सस्ता और विश्व‑स्तरीय समाधान तैयार करने पर ध्यान दे।
नवाचार को प्राथमिकता क्यों?
भारत की मौजूदा सरकारी खरीद नीति सबसे कम बोली को प्राथमिकता देती है, जिससे कंपनियों को लागत‑कटौती पर अधिक ध्यान देना पड़ता है और जोखिम‑भरे प्रयोगों से बचना पड़ता है। मसेलकर ने इस नीति को “तकनीकी उन्नति और स्वदेशी नवाचार के सबसे बड़े अवरोध” कहा। उन्होंने सरकार को “सबसे सस्ते उत्पादों की खरीदार” से “जोखिम‑साझा करने वाले साथी” में बदलने की अपील की।
सस्ती, विश्व‑स्तरीय समाधान का महत्व
मसेलकर ने कहा कि भारत का सबसे बड़ा अवसर ऐसे उत्पाद बनाना है जो कम संसाधन में उच्च प्रदर्शन दे और लाखों लोगों के लिए किफ़ायती हो। उन्होंने उदाहरण के रूप में एआई‑संचालित ट्यूबरक्युलोसिस पहचान, थर्मल इमेजिंग द्वारा कम लागत में स्तन कैंसर स्क्रीनिंग, डिजिटल मातृत्व स्वास्थ्य प्लेटफ़ॉर्म और गैर‑आक्रामक एनीमिया पहचान तकनीक को प्रस्तुत किया। ये सभी “कम से अधिक, सभी के लिये अधिक” की गांधीवादी भावना को दर्शाते हैं।
उद्यमिता और सार्वजनिक‑निजी सहयोग
डिजिटल डेटा क्रांति, गहन‑टेक स्टार्ट‑अप और हाइड्रोजन जैसी पहलें भारत की नवाचार क्षमता को साबित करती हैं। मसेलकर ने उद्योग को वैश्विक बेहतरीन प्रथाओं की नकल करने के बजाय “अगली प्रथाएँ” बनाने की चुनौती दी। उन्होंने एआई को “को‑पायलट” कहा, जो मानव निर्णय, नैतिकता और सहानुभूति को केंद्र में रखे।
भविष्य की राह
फिक्की के पूर्व अध्यक्ष राजवर्धन वी. कानोरिया ने कहा, “नवाचार प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, यह आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी नेतृत्व और समावेशी विकास का मुख्य प्रेरक है।” इस संदर्भ में, भारत को न केवल बड़ी कंपनियों को बढ़ावा देना चाहिए, बल्कि छोटे‑और‑मध्यम उद्यमियों को भी जोखिम‑साझा मॉडल के तहत समर्थन देना चाहिए।