फ़िलिपींस के दो‑साल के जुड़वां टायलर और केली को दिल्ली के इंदिरप्रस्थ अपोलो अस्पताल में पहली बार बाल्यकाल में दोहरा लिवर ट्रांसप्लांट मिला। माँ ने एक बच्चे को और मातृचाचा ने दूसरे को अपना लिवर हिस्सा दान किया, जिससे दोनों स्वस्थ हो गए।
फ़िलिपींस के दो‑साल के जुड़वां टायलर और केली, जो जन्म से ही प्री‑टर्म और कम वजन (2 kg एवं 2.4 kg) के कारण कई स्वास्थ्य जाँचों से गुज़र रहे थे, को जन्म के दो हफ़्ते बाद ही पीलिया और बाइल्ड डक्ट की दुर्लभ विकृति – कोलेडोकल सिस्ट टाइप IVA – का पता चला। यह रोग बाइल डक्ट को सूजने और अंततः यकृत विफलता की ओर ले जाता है, और विश्व में 100,000 में से केवल एक बच्चे को ही प्रभावित करता है।
रोग की प्रगति और उपचार की चुनौतियाँ
जुड़वां दोनों ने महीनों तक आंतरिक रक्तस्राव, पेट में तरल जमा होना और वजन में स्थिरता जैसी गंभीर जटिलताओं का सामना किया। पारंपरिक उपचार असफल रहने के बाद, चिकित्सकों ने अंततः लिवर ट्रांसप्लांट को एकमात्र जीवित विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया। दो जीवित दाताओं की आवश्यकता, विशेषकर दो छोटे बच्चों के लिए, एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति है; इंदिरप्रस्थ अपोलो में अब तक 645 बाल्यकाल लिवर ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, पर यह पहली बार है जब दो जुड़वां एक साथ ऑपरेशन करवाते हैं।
परिवार की अद्भुत बलिदान
पिता चिकित्सकीय कारणों से दाता नहीं बन पाए, इसलिए माँ ने एक बच्चे के लिए अपना 20 % लिवर दान किया, जबकि मातृचाचा ने दूसरे के लिए समान हिस्सा प्रदान किया। डॉक्टर नीरव गोयल ने बताया कि लिवर की भागीदारी के बाद दोनों दाताओं के लिवर में पुनः वृद्धि होती है, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
ऑपरेशन की सफलता और भविष्य की संभावनाएँ
शल्य चिकित्सक अनूपम सिबाल ने कहा कि यह ऑपरेशन तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि दोनों शिशु बहुत छोटे थे और उनके शरीर में रक्त‑संचार प्रणाली अभी पूरी तरह विकसित नहीं थी। फिर भी, सफल ट्रांसप्लांट के बाद टायलर और केली अब अस्पताल से घर लौट चुके हैं और सामान्य जीवन जीने की दिशा में अग्रसर हैं। यह केस लिवर पुनर्जनन विज्ञान और बहु‑दाताओं वाले जटिल ट्रांसप्लांट प्रोटोकॉल के लिए एक मील का पत्थर बन गया है।
सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य
यह कहानी न केवल चिकित्सा विज्ञान की प्रगति को दर्शाती है, बल्कि परिवार के अटूट समर्थन और सामाजिक एकजुटता को भी उजागर करती है। भविष्य में ऐसे दुर्लभ मामलों के लिए अधिक जागरूकता, दाता नेटवर्क का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक होगा, ताकि और अधिक जीवन बचाए जा सकें।