इंडिया टुडे ने भारत में पहला व्यापक सहमति सर्वेक्षण जारी किया, जिसमें महिलाओं को ‘ना’ कहने के बाद मिलने वाले सामाजिक और पारिवारिक दबावों को उजागर किया गया। परिणाम नीति निर्माताओं और समाज को जागरूक करने का आह्वान हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पहला व्यापक सर्वेक्षण
- महिलाओं के ‘ना’ को सामाजिक बाधाओं से जूझना
- नीति और जागरूकता में बदलाव की आवश्यकता
हर दिन भारत के लाखों घरों में एक मौन संघर्ष चलता है—जब एक महिला ‘ना’ कहती है, तो उसे अपने शब्दों के परिणामों का हिसाब‑किताब करना पड़ता है। इस प्रश्न का उत्तर—क्या उसकी ‘ना’ को मान्यता मिलती है—इंडिया टुडे के पहले कंसेंट सर्वेक्षण का केंद्र बिंदु बन गया।
सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि
जुलाई 2026 में प्रकाशित यह सर्वेक्षण 10,000 से अधिक भारतीय महिलाओं से एकत्रित डेटा पर आधारित है, जिसमें शहरी‑ग्रामीण विभाजन, आयु समूह और शैक्षिक स्तर को ध्यान में रखा गया। शोधकर्ता कौशिक डेका ने इस पहल को ‘सामाजिक न्याय’ के हिस्से के रूप में वर्णित किया, यह दर्शाते हुए कि भारत में सेक्स और सहमति पर खुली चर्चा अभी भी कई सामाजिक बाधाओं से घिरी हुई है।
मुख्य निष्कर्ष
सर्वेक्षण ने तीन प्रमुख रुझान उजागर किए: (i) 57% महिलाएँ कहती हैं कि ‘ना’ कहने पर उन्हें अपने साथी या रिश्तेदारों से मनोवैज्ञानिक दबाव का सामना करना पड़ता है; (ii) 42% respondents ने बताया कि ‘ना’ कहने के बाद उन्हें सामाजिक बहिष्कार या घर के भीतर असहायता का सामना करना पड़ा; (iii) 68% महिलाओं ने कहा कि उनके परिवार के सदस्य अक्सर उनकी सहमति को “संदेह” की नजर से देखते हैं, जिससे उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा में कठिनाई होती है।
निहितार्थ और भविष्य की दिशा
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सिर्फ कानूनी उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं; सामाजिक मान्यताओं में परिवर्तन आवश्यक है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में जीवन कौशल और सहमति शिक्षा को अनिवार्य किया जाए, साथ ही मीडिया को जिम्मेदार रिपोर्टिंग के लिए दिशानिर्देश स्थापित करने चाहिए। इसके अतिरिक्त, नीति निर्माताओं को कार्यस्थल और घर दोनों में ‘ना’ को सुरक्षित शब्द बनाने के लिए सख्त नियम लागू करने चाहिए।
निष्कर्ष
इंडिया टुडे का यह सर्वेक्षण भारत में सेक्स और सहमति पर दीर्घकालिक विमर्श की शुरुआत को चिह्नित करता है। इसे आगे बढ़ाने के लिए नागरिक समाज, सरकारी एजेंसियों और मीडिया के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक है, ताकि हर महिला को ‘ना’ कहने का अधिकार बिना किसी दंड के मिल सके।