कन्नूर के निजी अस्पताल में एक साल के बच्चे की लिप कट की सर्जरी के बाद एनेस्थीसिया दिया गया, जिससे वह बेहोश हो गया और अंत में आईसीयू में मृत्यु हो गई। एनेस्थेटिस्ट डॉ. अंजलि पोडुवाल को लापरवाही के आरोप में बुक किया गया, जबकि अस्पताल ने सभी संभव उपचार देने का दावा किया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कन्नूर में 1.5 साल के टॉडलर की लिप कट के बाद एनेस्थीसिया से मौत
  • बेबि मेमोरियल अस्पताल की एनेस्थेटिस्ट डॉ. अंजलि पोडुवाल पर लापरवाही का आरोप
  • हस्पताल ने सभी संभव उपचार देने का दावा, मामला अभी जांच के दौर में

पेयन्नूर, कन्नूर में स्थित निजी बेबि मेमोरियल अस्पताल (BMH) में एक साल के बच्चे, देवांश शौरिया, को लिप कट की सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया दिया गया। बचपन में छोटे-छोटे चोटें अक्सर मामूली मानी जाती हैं, पर इस मामले में एनेस्थीसिया के बाद बच्चे की स्थिति बिगड़ गई।

घटना की क्रमबद्धता

रविवार को खेलते समय गिरने के कारण देवांश की लिप में कट लग गया। परिवार ने तुरंत अस्पताल ले जाकर डॉक्टरों ने घाव को सिलाई करने के लिए सामान्य एनेस्थीसिया की सलाह दी। एनेस्थीसिया देने के कुछ ही मिनटों में बच्चा बेहोश हो गया, जिससे चिकित्सकों ने उसे कन्नूर के दूसरे बेबी मेमोरियल अस्पताल में स्थानांतरित किया। वह आईसीयू में भर्ती हुआ, लेकिन कई घंटे बाद वह निधन हो गया।

क़ानूनी कार्रवाई और अस्पताल का उत्तर

पेयन्नूर पुलिस ने इस घटना की शिकायत के आधार पर डॉ. अंजलि पोडुवाल को लापरवाही के आरोप में बुक किया। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, एनेस्थीसिया के दौरान मानक प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया, जिससे शिशु की श्वसन प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ा। अस्पताल ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने सभी संभावित उपचार प्रदान किए और कोई भी चूक नहीं हुई।

भारत में बाल एनेस्थीसिया की व्यापक समस्या

भारत में बाल एनेस्थीसिया से जुड़ी कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जिनमें चिकित्सकीय लापरवाही, अनुचित डोज़िंग, और मॉनिटरिंग की कमी प्रमुख कारण रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में बाल एनेस्थीसिया से जुड़ी मृत्यु दर में 15% की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों ने कहा कि अस्पतालों को विशेष बाल एनेस्थीसिया इकाइयाँ स्थापित करनी चाहिए और एनेस्थेटिस्ट को नियमित रूप से अपडेटेड प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

भविष्य की संभावनाएँ और सामाजिक प्रभाव

यह केस न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करता है। यदि जांच में लापरवाही सिद्ध होती है, तो यह केस राष्ट्रीय स्तर पर एनेस्थीसिया प्रोटोकॉल को सख्त करने, रोगी सुरक्षा के लिए अधिक कठोर मानक लागू करने और माता‑पिता को उचित जानकारी प्रदान करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।