राजस्थानी कोटा के दो सरकारी अस्पतालों में सी‑सेक्शन के बाद पाँच माताओं की मौतें नकली ऑक्सीटॉसिन सिरिंज से जुड़ी पाई गईं। जांच में पता चला कि इन सिरिंजों में सक्रिय दवा की बजाय केवल पानी था, जिससे माताओं को पोस्ट‑पार्टम रक्तस्राव से बचाव नहीं हो सका। यह घटना भारत में दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा की गंभीर समस्या को फिर से उजागर करती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कोटा के दो सरकारी अस्पतालों में सी‑सेक्शन के बाद पाँच माताओं की मौतें नकली ऑक्सीटॉसिन से हुईं।
- जांच में पता चला कि इंजेक्शन की बोतलें केवल पानी रखती थीं, कोई सक्रिय घटक नहीं था।
- फार्मा लाइसेंस रद्द, कड़ी नियामक कार्रवाई और तीन‑स्तरीय दवा परीक्षण प्रणाली की मांग बढ़ी।
रायश्ह्स के कोटा में इस साल मई में दो सरकारी अस्पतालों में सी‑सेक्शन करवाने वाली पाँच महिलाएँ कई दिन बाद दम तोड़ गईं। इन मृत्यु के बाद किया गया लैब परीक्षण दर्शाता है कि उन महिलाओं को दी गई ऑक्सीटॉसिन सिरिंजें एक विशिष्ट बैच की थीं, जिनमें सक्रिय दवा नहीं, केवल पानी ही था। परिणामस्वरूप, पोस्ट‑पार्टम रक्तस्राव को रोकने के लिए आवश्यक टोनिक प्रभाव नहीं मिला और माताओं की जीवन‑रक्षा क्षमताएँ गंभीर रूप से प्रभावित हुईं।
ऑक्सीटॉसिन का महत्व और नकली दवा की जाँच
ऑक्सीटॉसिन एक प्राकृतिक हार्मोन है जो प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन को प्रेरित करता है और प्रसवोत्तर स्तनपान में दूध के प्रवाह को नियंत्रित करता है। चिकित्सकों द्वारा निर्मित सिंथेटिक रूप, जैसे Syntocinon और Pitocin, का उपयोग प्रसव को प्रेरित करने या सी‑सेक्शन के बाद गर्भाशय को जल्दी‑से‑क्लैंप करने के लिए किया जाता है, जिससे रक्तस्राव को न्यूनतम किया जा सके। इस मामले में, सक्रिय घटक की अनुपस्थिति ने इन प्रक्रियाओं को विफल कर दिया, जिससे माताओं की रक्तस्राव नियंत्रण तंत्र पूरी तरह टूट गया।
नियामक कार्रवाई और उद्योग प्रतिक्रिया
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) ने भारत सरकार से इस नकली ऑक्सीटॉसिन की आपूर्ति के बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांगी। साथ ही, केंद्र और राज्य स्तर के दवा नियामकों – CDSCO और संबंधित राज्य दवा नियंत्रण बोर्डों – ने जैक्सन लैबोरेटरी (पंजाब) तथा हिमाचल प्रदेश की फार्मा यूनिटों के लाइसेंस रद्द कर दिए। यह कदम उन कंपनियों के खिलाफ सख़्त संदेश है जो नियामक मानकों की अवहेलना करती हैं।
भारत में दवा गुणवत्ता की व्यापक समस्या
नकली ऑक्सीटॉसिन की यह घटना भारत में दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा की गहरी समस्या को फिर से उजागर करती है। पिछले कुछ वर्षों में डायथाइल ग्लाइकोल से दूषित कफ़ सिरप जैसी घटनाओं ने बच्चों की मृत्यु का कारण बना है, जिससे सार्वजनिक भरोसा क्षीण हो रहा है। निरंतर गुणवत्ता नियंत्रण की कमी, अनुचित निर्माण प्रक्रियाएँ और नियामक निरीक्षण की कमज़ोरियां इस संकट के मुख्य कारण माने जा रहे हैं।
भविष्य की दिशा: कड़ी निगरानी और तीन‑स्तरीय परीक्षण
रायश्ह्स राज्य सरकार ने तुरंत तीन‑स्तरीय दवा परीक्षण प्रणाली लागू करने का आदेश दिया है, जिसमें प्रत्येक बैच का नमूना परीक्षण, नियमित मॉनिटरिंग और लाइसेंस रद्दीकरण शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी प्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत करके दवा निर्माण की पारदर्शिता बढ़ायी जा सकती है और भविष्य में समान त्रुटियों को रोका जा सकता है।