भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के सरकारी अस्पतालों में पिछले दो हफ़्तों में कुल नौ प्रसूतियों की मौत हुई, जिससे राज्य की मातृ‑शिशु स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। जयपुर से भेजी गई दो‑सदस्यीय विशेषज्ञ टीम अब कारणों की गहन जांच करेगी।

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भीलवाड़ा में 6 दिन में 5 तथा बांसवाड़ा में 4 प्रसूतियों की मौत
  • सिजेरियन डिलीवरी के बाद इन्फेक्शन और मेडिकल कॉम्प्लिकेशन के आरोप
  • जयपुर की विशेषज्ञ टीम ने केस की गहन जांच शुरू की

राजस्थान के भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में सार्वजनिक अस्पतालों में मातृ मृत्यु की श्रृंखला ने स्वास्थ्य विभाग को अडिग कर दिया है। केवल छह दिनों में भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में मातृ एवं शिशु चिकित्सा केंद्र (MCH) में पाँच महिलाओं की मौत और बांसवाड़ा के समान संस्थान में चार दिनों में चार महिलाओं की मृत्यु हुई। सभी मामलों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद जटिलताओं का हवाला दिया गया है, जबकि परिवारों ने लापरवाही और संक्रमण के आरोप लगाये हैं।

पृष्ठभूमि और इतिहास

राजस्थान में पिछले दो वर्षों में कोटा, बीकानेर और अब भीलवाड़ा‑बांसवाड़ा में मातृ मृत्यु की घटनाएँ क्रमशः पाँच, छह और नौ मामलों में बढ़ी हैं। मई 2025 में कोटा के सरकारी अस्पताल में चार प्रसूतियों की मौत हुई, जबकि जून 2025 में बीकानेर में सिजेरियन के बाद किडनी फेल होने से दो मौतें दर्ज हुईं। यह प्रवृत्ति राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में गहरी structural समस्याओं को उजागर करती है, जैसे सीमित सर्जिकल सेट, अपर्याप्त स्टरलाइजेशन प्रोटोकॉल और असमान रोगी‑निगरानी।

वर्तमान जांच और प्रतिक्रियाएँ

राज्य सरकार ने जयपुर से दो चिकित्सक—डॉ. पवन और डॉ. अभिनव—की विशेष टीम भेजी है, जो सभी मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन थिएटर के सैंपल और हाई‑रिस्क प्रेग्नेंसी मामलों की स्वतंत्र समीक्षा करेंगे। जिला कलेक्टर जसमीत सिंह संधू ने कहा कि प्रारंभिक रिपोर्ट में संक्रमण नहीं, बल्कि मेडिकल कॉम्प्लिकेशन प्रमुख कारण माना गया है, परन्तु सभी संभावित कारणों का निरपेक्ष परीक्षण किया जाएगा।

संभावित प्रभाव और भविष्य की दिशा

यदि जांच में लापरवाही या संसाधन‑अभाव सिद्ध होता है, तो राज्य सरकार को अस्पतालों में सर्जिकल सेट की संख्या बढ़ाने, स्टरलाइजेशन समय को नियमानुसार सुनिश्चित करने और मातृ‑शिशु देखभाल के लिए विशेष इकाइयों की स्थापना करने का दबाव रहेगा। साथ ही, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मातृ मृत्यु को 2030 तक 50 % कम करने की लक्ष्य प्राप्ति के लिए यह मामला एक चेतावनी संकेत बन सकता है।

अंत में, यह घटनाक्रम न केवल स्थानीय समुदाय के विश्वास को चुनौती देता है, बल्कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकताएँ भी स्पष्ट करता है।