केरल हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय कैंसर संस्थान, चित्तरंजन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान, थिरुवनंतपुरम का रीजनल कैंसर सेंटर और भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। यह जांच रिबोसायिक्लिब और पाल्बोसायक्लिब के बीच प्रतिस्थापन की संभावना पर केंद्रित है, जिससे महँगी दवाओं की पहुँच में सुधार हो सके।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- केरल हाई कोर्ट ने रिबोसायिक्लिब और पाल्बोसायक्लिब के प्रतिस्थापन की संभावना पर रिपोर्ट मांगी।
- अमीकस क्युरिए ने दवा की कीमत और पेटेंट मुद्दे को उजागर किया।
- रिपोर्ट 21 अगस्त को सुनवाई के लिए प्रस्तुत की जाएगी।
केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वाकांक्षी निर्देश जारी किया है, जिसमें राष्ट्रीय कैंसर संस्थान (NCI) झज्जर, चित्तरंजन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान कोलकाता, थिरुवनंतपुरम का रीजनल कैंसर सेंटर (RCC) और भारतीय ड्रग कंट्रोलर जनरल (DCGI) को यह रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया गया है कि क्या रिबोसायिक्लिब और पाल्बोसायक्लिब, दोनों स्तन कैंसर के उपचार में प्रयुक्त दवाएँ, एक-दूसरे के विकल्प के रूप में कार्य कर सकती हैं।
पृष्ठभूमि और कानूनी पहलू
न्यायाधीश हरिशंकर वी. मेनन ने यह आदेश एक su̱o motu याचिका के जवाब में दिया, जिसमें जीवनरक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमतों को चुनौती दी गई थी। यह याचिका एक स्तन कैंसर रोगी द्वारा दायर की गई थी, जिसने महँगी दवा न मिलने के कारण मृत्यु का सामना किया, जबकि उसकी अपील कोर्ट में चल रही थी।
दवा की लागत और पेटेंट विवाद
अमीकस क्युरिए ने बताया कि नॉवार्टिस एजी द्वारा निर्मित रिबोसायिक्लिब की कीमत 2022 में लगभग ₹58,000 प्रति माह थी। उन्होंने सरकार को पेटेंट को “सरकार के उद्देश्यों” के तहत लेन या दवा को आवश्यक वस्तु घोषित कर मोनोपॉली को रोकने का प्रस्ताव रखा। दूसरी ओर, एलि लिली और नॉवार्टिस ने तर्क दिया कि रिबोसायिक्लिब को आवश्यक वस्तु घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पाल्बोसायक्लिब भारत में कई कंपनियों द्वारा निर्मित और सस्ती कीमत पर उपलब्ध है।
वैज्ञानिक मतभेद और आगे की कार्रवाई
अमीकस क्युरिए ने यह भी उजागर किया कि दोनों दवाओं के क्लिनिकल और टॉक्सिकोलॉजिकल प्रोफाइल अलग-अलग हैं और उन्हें परस्पर बदलना सुरक्षित नहीं हो सकता। नॉवार्टिस ने जवाब दिया कि दोनों अलग‑अलग अणु हैं, लेकिन समान प्रकार के स्तन कैंसर के उपचार में प्रयुक्त होते हैं। कोर्ट ने अंततः NCI, चित्तरंजन NCI, RCC और DCGI की विस्तृत रिपोर्टों की माँग की, जो 21 अगस्त को पुनः सुनवाई में प्रस्तुत की जाएँगी।
संभावित प्रभाव
यदि रिपोर्टें दर्शाती हैं कि पाल्बोसायक्लिब एक व्यावहारिक विकल्प है, तो यह भारत में कैंसर रोगियों के लिए दवा की पहुँच को सस्ते स्तर पर लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके अलावा, पेटेंट के पुनः मूल्यांकन से भविष्य में अन्य महँगी दवाओं के लिए समान कानूनी प्रक्रियाएँ स्थापित हो सकती हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में व्यापक बदलाव की उम्मीद है।