पांच नई माताओं ने किडनी ट्रांसप्लांट के अभाव में इयुथेनिया की अपील की, जबकि अस्पताल ने उपचार जारी रहने और रोगियों की स्थिर स्थिति की पुष्टि की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पांच नई माताओं ने राष्ट्रपति को इयुथेनिया की याचिका भेजी
- 48 घंटे की अल्टिमेटम के बाद भी जिला प्राधिकरणों से कोई आश्वासन नहीं मिला
- अस्पताल ने कहा सभी रोगी स्थिर हैं और उपचार जारी है
भारत में अंगदान की गंभीर कमी से कई रोगी, विशेषकर किडनी रोगियों को अनिश्चित इंतजार का सामना करना पड़ रहा है। इस वर्ष ही कई मामलों में रोगियों या उनके परिवारों ने जीवन समाप्ति के विकल्प के रूप में इयुथेनिया (स्वेच्छा मृत्यु) की मांग की है, जो भारतीय कानूनी ढाँचे में अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है।
पृष्ठभूमि और कानूनी संदर्भ
वर्तमान में भारत में इयुथेनिया को केवल अत्यधिक दर्द और रोग की अंतिम अवस्था में ही वैध माना जाता है, और इसके लिए उच्च न्यायालय की विशेष अनुमति आवश्यक है। हालाँकि, इस प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग लगातार बढ़ रही है, विशेषकर उन रोगियों के लिए जिनकी स्थिति अस्थायी सुधार की आशा नहीं देती।
नयी माताओं की अपील
पाँच नई माताओं—जिनमें से प्रत्येक अपने नवजात शिशु की देखभाल के साथ ही गंभीर किडनी विफलता से जूझ रही हैं—ने राष्ट्रपति को एक औपचारिक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि अगले 48 घंटे में किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो वे इयुथेनिया का विकल्प अपनाने के लिए तैयार हैं। यह पत्र जिले के स्वास्थ्य प्राधिकरणों को भेजे गए अल्टिमेटम के समाप्त होने के बाद आया, जिसमें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।
अस्पताल की स्थिति
सम्बन्धित अस्पताल ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि सभी रोगियों का उपचार जारी है और वर्तमान में उनकी स्थिति स्थिर है। अस्पताल ने यह भी कहा कि वे संभावित डोनर किडनी की खोज में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अंगदान के अभाव को लेकर व्यापक प्रणालीगत चुनौतियाँ हैं।
भविष्य के प्रभाव
यह घटना भारतीय स्वास्थ्य नीति में एक नया मोड़ पेश कर सकती है। यदि राष्ट्रपति या केंद्र सरकार इस प्रकार के अनुरोधों को गंभीरता से लेते हैं, तो यह अंगदान के तंत्र को तेज़ करने, सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने, और इयुथेनिया के नियमन को पुनः विचार करने की दिशा में प्रेरित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अपीलें केवल व्यक्तिगत दर्द ही नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य ढाँचे की कमी को भी उजागर करती हैं।