केरल के उपभोक्ता आयोग ने 23‑दिन के शिशु को सर्कमिसन के बाद गंभीर जननांग क्षति के कारण उसकी माँ को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिलवाया। आयोग ने डॉक्टर, अस्पताल मालिक और संस्थान को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए भविष्य के उपचार और मनोवैज्ञानिक कष्टों को ध्यान में रखा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 23‑दिन के शिशु को सर्कमिसन के बाद स्थायी जननांग क्षति हुई
- केरल उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर, अस्पताल और मालिक को संयुक्त रूप से 50 लाख रुपये के नुकसान की भरपाई का आदेश दिया
- मामले ने चिकित्सा सुविधा, स्वच्छता और विशेषज्ञता की कमी को उजागर किया
केरल के उपभोक्ता आयोग ने एक विवादास्पद मामले में डॉक्टर और निजी अस्पताल को शिशु की माँ को ₹50 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। शिशु, जो केवल 23 दिन का था, एक सामान्य सर्कमिसन प्रक्रिया के बाद गंभीर जननांग विकृति, संक्रमण और मूत्रमार्ग की जटिलताओं से ग्रस्त हो गया।
पृष्ठभूमि और घटना का क्रम
शिशु का सर्कमिसन स्थानीय अस्पताल में किया गया, जहाँ माँ ने बताया कि प्रक्रिया के तुरंत बाद बच्चा पेशाब करने में कठिनाई, लगातार रोना और पैड से पेशाब लीक होना शुरू हो गया। कई बार अस्पताल लौटने के बावजूद स्थिति बिगड़ती गई, अंततः त्रिशूर के उच्चस्तरीय चिकित्सा केंद्र में आपातकालीन मूत्रविकल्प शल्यक्रिया करवाई गई।
न्यायिक प्रक्रिया और आयोग का निष्कर्ष
आयोग ने जांच में पाया कि डॉक्टर को सर्कमिसन में पर्याप्त अनुभव नहीं था और अस्पताल में स्वच्छता एवं स्टेरिलाइज़ेशन मानकों का पालन नहीं किया गया। मेडिकल रिकॉर्ड ने संक्रमण, टिश्यू स्लाउइंग, मीटाल स्टेनोसिस और निचले जननांग के जीवन‑संकट की पुष्टि की। इन सभी संकेतों से यह स्पष्ट हुआ कि चिकित्सा लापरवाही ने शिशु के भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
भविष्य के उपचार और मुआवजा विवरण
आयोग ने दर्द, कष्ट, मनोवैज्ञानिक प्रभाव, भविष्य के पुनर्निर्माण शल्यक्रिया, और संभावित मूत्र, यौन तथा प्रजनन कार्यों की अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए मुआवजा विभाजित किया: ₹25 लाख दर्द‑सहायता के लिए, ₹25 लाख भविष्य के उपचार के लिए, और ₹25 हज़ार litigation खर्च के लिए। डॉक्टर, अस्पताल मालिक और संस्थान को संयुक्त रूप से उत्तरदायी ठहराया गया।
समाज और स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रभाव
यह मामला भारत में बाल चिकित्सा प्रक्रियाओं, विशेषकर सर्कमिसन जैसे सामान्य लेकिन संवेदनशील कार्यों में मानक पालन की आवश्यकता को उजागर करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लिये ऐसी प्रक्रियाएँ केवल योग्य चिकित्सकों द्वारा, उचित स्टेरिलाइज़ेशन और पोस्ट‑ऑपरेटिव फॉलो‑अप के साथ ही की जानी चाहिए।