पुणे के NCCS वैज्ञानिकों ने भारत की विभिन्न जनजातीय समुदायों में 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियों और लगभग 200 नए सूक्ष्मजीव उपभेदों (strains) की पहचान की है। यह खोज बताती है कि एक स्वस्थ आंत हमारे आहार, भूगोल और जीवनशैली पर निर्भर करती है।
मुख्य बातें
- NCCS पुणे के वैज्ञानिकों ने 14 नई बैक्टीरिया प्रजातियों की खोज की है।
- भारतीय जनजातीय समुदायों में लगभग 200 नए माइक्रोबियल स्ट्रेन मिले हैं।
- यह शोध साबित करता है कि 'स्वस्थ आंत' का कोई एक वैश्विक मानक नहीं है।
- पश्चिमी देशों के प्रोबायोटिक्स भारतीय आहार के लिए पूरी तरह सटीक नहीं हो सकते हैं।
BRIC–नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (NCCS), पुणे के वैज्ञानिकों ने भारत की जनजातीय समुदायों के गट माइक्रोबायोम का अध्ययन करते हुए 14 अज्ञात बैक्टीरिया प्रजातियों और लगभग 200 स्थानीय सूक्ष्मजीव उपभेदों (strains) की पहचान की है। यह खोज इस बात को रेखांकित करती है कि भारत की सूक्ष्मजीवी विविधता का कितना बड़ा हिस्सा अब भी अनछुआ है।
Gut Microbes जर्नल में प्रकाशित यह शोध इस विचार को चुनौती देता है कि एक 'स्वस्थ' गट माइक्रोबायोम का कोई सार्वभौमिक मानक होता है। इसके बजाय, यह दर्शाता है कि हमारी आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव इस बात से आकार लेते हैं कि हम कहाँ रहते हैं, क्या खाते हैं और किस समुदाय से संबंध रखते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह खोज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अब तक, चिकित्सा अनुसंधान काफी हद तक पश्चिमी आबादी के डेटा पर निर्भर रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारतीय आंत के माइक्रोबायोम को केवल इसलिए 'असामान्य' नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वह पश्चिमी संदर्भ आबादी से भिन्न है। हमें अपनी आबादी के विशिष्ट डेटा की आवश्यकता है।
"भारतीय गट माइक्रोबायोम को केवल इसलिए असामान्य नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि यह पश्चिमी संदर्भ आबादी से भिन्न है। हमें विभिन्न समुदायों में स्वास्थ्य को समझने के लिए जनसंख्या-विशिष्ट डेटा की आवश्यकता है," डॉ. धीरज धोत्रे ने कहा।
अध्ययन में भारत के आठ अलग-अलग जनजातीय समुदायों का विश्लेषण किया गया, जिनमें पश्चिमी तट के वारली, दक्कन के पठार के गोंड और माडिया, पूर्वोत्तर की काबुई (रोंगमेई नागा) और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र के बोटो, बाल्टी, ब्रोकपा और पुरीगपा शामिल हैं।
आहार और सूक्ष्मजीवों का संबंध
सबसे बड़े अंतर ट्रांस-हिमालयी समुदायों में देखे गए, जिनका पारंपरिक आहार दूध, मक्खन, गेहूं और जौ पर आधारित है। इन समुदायों में Bifidobacterium का स्तर काफी अधिक पाया गया, जो उनके स्थानीय आहार के प्रति अनुकूलन को दर्शाता है।
Frequently Asked Questions
1. गट माइक्रोबायोम क्या है?
यह हमारी आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया, कवक और वायरस का एक विशाल समुदाय है जो पाचन और इम्युनिटी में मदद करता है।
2. इस खोज का महत्व क्या है?
यह भारत के लिए एक विशिष्ट माइक्रोबायोम मानचित्र बनाने की आवश्यकता पर जोर देती है ताकि बेहतर पोषण और व्यक्तिगत चिकित्सा विकसित की जा सके।