पुदुचेरी के प्रतिष्ठित संस्थान जिपमेर ने नवजात शिशुओं में जन्मजात विकारों की पहचान के लिए एक व्यापक 'यूनिवर्सल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग' कार्यक्रम और समर्पित प्रयोगशाला की शुरुआत की है। यह पहल बच्चों में गंभीर बीमारियों के लक्षणों के प्रकट होने से पहले ही उनका इलाज संभव बनाएगी।
मुख्य बातें
- जिपमेर ने जन्मजात विकारों की पहचान के लिए यूनिवर्सल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग (NBS) कार्यक्रम शुरू किया।
- एक समर्पित NBS प्रयोगशाला स्थापित की गई है जो रक्त के नमूनों का परीक्षण करेगी।
- इसका उद्देश्य चयापचय (metabolic) और अंतःस्रावी विकारों का शुरुआती चरण में पता लगाना है।
- जल्द पहचान से बच्चों में बौद्धिक विकलांगता और अंग विफलता को रोका जा सकेगा।
पुदुचेरी: जवाहरलाल संस्थान स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान (Jipmer) ने नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा में एक मील का पत्थर स्थापित करते हुए 'यूनिवर्सल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग' (NBS) कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य संस्थान में जन्म लेने वाले प्रत्येक पात्र नवजात शिशु में जन्मजात विकारों की शीघ्र पहचान करना है।
इस कार्यक्रम का उद्घाटन जिपमेर के मेडिकल सुपरिटेंडेंट साका विनोद कुमार द्वारा किया गया। नई स्थापित NBS प्रयोगशाला में, शिशुओं के पैर के तलवे से रक्त का एक छोटा नमूना (Dried Blood Spot) लेकर परीक्षण किया जाएगा। यह प्रक्रिया सरल है लेकिन इसके परिणाम जीवन रक्षक हो सकते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, नवजात शिशुओं में कई गंभीर बीमारियाँ जन्म के समय दिखाई नहीं देतीं, लेकिन वे भविष्य में गंभीर विकलांगता का कारण बन सकती हैं। यह स्क्रीनिंग कार्यक्रम उन छिपे हुए चयापचय (metabolic) और अंतःस्रावी (endocrine) विकारों को पकड़ने में मदद करेगा जो लक्षणों के प्रकट होने से पहले ही उपचार योग्य होते हैं।
शिशुओं में जन्मजात विकारों की जल्द पहचान करने से जीवन भर की विकलांगता और मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जिपमेर के निदेशक वीर सिंह नेगी ने कहा कि यह पहल संस्थान के निवारक सेवाओं (preventive services) के विस्तार के दृष्टिकोण के अनुरूप है। उन्होंने भविष्य में इस कार्यक्रम के दायरे को और बढ़ाने की योजना भी साझा की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विश्व स्तर पर, नवजात स्क्रीनिंग को सार्वजनिक स्वास्थ्य के सबसे प्रभावी हस्तक्षेपों में से एक माना जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में, जहाँ पोषण और आनुवंशिक बीमारियों का प्रभाव अधिक है, जिपमेर जैसी संस्थाओं द्वारा ऐसी उन्नत प्रयोगशालाओं की स्थापना स्वास्थ्य सेवा के स्तर को वैश्विक मानकों के बराबर लाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह स्क्रीनिंग प्रक्रिया कैसे काम करती है?
यह एक सरल 'हील-प्रिक' (एड़ी से रक्त लेना) प्रक्रिया है, जिसके बाद रक्त के सूखे धब्बे का प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है।
2. यदि स्क्रीनिंग सकारात्मक आती है तो क्या होगा?
संस्थान एक बहुआयामी टीम के माध्यम से पुष्टि के लिए जांच और तुरंत उपचार शुरू करने की व्यवस्था करता है।