आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल डेटा विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जैविक डिजाइनों को आकार दे रहा है। जहाँ यह कैंसर और हृदय रोगों के उपचार में क्रांति ला सकता है, वहीं वायरस के डिजाइन की क्षमता सुरक्षा संबंधी गंभीर सवाल खड़े करती है।

  • AI अब जैविक संरचनाओं और वायरस के जीनोम डिजाइन करने में सक्षम हो रहा है।
  • हृदय रोग की भविष्यवाणी करने वाले AI मॉडल आशाजनक हैं, लेकिन अभी नैदानिक उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
  • भारत में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लेटिन जैसी महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाओं की कमी एक गंभीर संकट है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर को 'अधिसूचित रोग' घोषित करने का निर्देश दिया है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब चिकित्सा और जीव विज्ञान के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर रहा है। हालिया शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि AI अब केवल सूचनाओं का विश्लेषण नहीं कर रहा, बल्कि यह जैविक डिजाइनों (Biological Designs) को प्रस्तावित करने की क्षमता विकसित कर चुका है। स्टैनफोर्ड के एक प्रयोग में, AI का उपयोग 'बैक्टीरियोफेज' (ऐसे वायरस जो बैक्टीरिया को खाते हैं) डिजाइन करने के लिए किया गया। हालांकि यह सीधे तौर पर खतरनाक मानव वायरस नहीं बना रहा है, लेकिन यह तथ्य कि कंप्यूटर अब वायरस के जीनोम का निर्णय ले सकते हैं, जैव-सुरक्षा (Biosecurity) के लिए एक बड़ी चुनौती है।

संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. अब्दुल गफूर के अनुसार, AI का यह विकास दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह चिकित्सा अनुसंधान में अभूतपूर्व अवसर प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर, यदि उचित शासन और सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो यह खतरनाक रोगजनकों (Pathogens) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। प्रयोगशाला में परीक्षण किए गए 285 AI-जनित डिजाइनों में से 16 ने कार्यात्मक फेज बनाए, जिनमें से कुछ ने उन बैक्टीरिया के खिलाफ भी काम किया जो मूल वायरस को मात दे चुके थे।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि चिकित्सा का भविष्य अब केवल जैविक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एल्गोरिदम और कोड के साथ गहराई से जुड़ गया है। यदि हम AI द्वारा डिजाइन किए गए जैविक तत्वों को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं, तो भविष्य में वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

कंप्यूटर ने वायरस नहीं बनाया, लेकिन इसने यह तय करने में मदद की कि वायरस का जीनोम कैसा होना चाहिए, जो कि कहीं अधिक परिणामी हो सकता है।

हृदय रोगों के क्षेत्र में भी AI का प्रभाव देखा जा रहा है। अफशान यस्मीन की एक समीक्षा के अनुसार, हृदय रोग की भविष्यवाणी करने वाले AI मॉडल अच्छे परिणाम दिखा रहे हैं, लेकिन अभी भी यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि ये मॉडल विभिन्न आबादी समूहों में सटीक रूप से काम करते हैं या नहीं। वर्तमान में, ये मॉडल नैदानिक (Clinical) उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं माने जा रहे हैं।

दूसरी ओर, आनुवंशिकी (Genetics) के क्षेत्र में वैज्ञानिक मानव जीनोम के 'स्विच ऑफ' होने की प्रक्रिया का अध्ययन कर रहे हैं। यह समझना कि प्रकृति कैसे कुछ जीन को निष्क्रिय कर देती है, भविष्य में कई बीमारियों के इलाज की कुंजी बन सकता है। इसके साथ ही, आनुवंशिक विकारों के प्रति सामाजिक कलंक को कम करने में भी विज्ञान बड़ी भूमिका निभा रहा है, जैसा कि डॉ. आलोक कुलकर्णी ने उल्लेख किया है।

भारत में कैंसर उपचार के मोर्चे पर, वर्तमान में एक गंभीर संकट बना हुआ है। सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लेटिन (Carboplatin) जैसी महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाओं की भारी कमी है। इसका मुख्य कारण कच्चे माल (प्लेटिनम) की बढ़ती वैश्विक लागत और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान है। इस संकट को देखते हुए, सरकार ने इन दवाओं के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कीमतों में अस्थायी वृद्धि की है।

Did You Know?: मानव जीनोम को एक विशाल निर्देश पुस्तिका की तरह माना जा सकता है, जिसमें 23 जोड़े गुणसूत्र (Chromosomes) अध्यायों की तरह कार्य करते हैं।

Frequently Asked Questions

1. क्या AI वास्तव में खतरनाक वायरस बना सकता है?
AI वर्तमान में जैविक डिजाइनों का प्रस्ताव दे रहा है। हालांकि यह सीधे वायरस नहीं बनाता, लेकिन यह उनके जीनोम की संरचना तय करने में मदद कर सकता है, जो सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक है।

2. भारत में कीमोथेरेपी दवाओं की कमी का क्या कारण है?
वैश्विक स्तर पर प्लेटिनम की बढ़ती लागत और समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान के कारण भारत में इन दवाओं की कमी हो रही है।