नागालैंड, कश्मीर, पंजाब और बिहार के चार परिवारों ने एक जटिल 'किडनी स्वैप' प्रक्रिया के माध्यम से अपने प्रियजनों की जान बचाई। दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद यह चार-तरफा किडनी विनिमय संभव हो सका।
- चार अलग-अलग राज्यों के परिवारों ने एक साथ मिलकर किडनी स्वैप किया।
- दिल्ली हाई कोर्ट ने कानूनी बाधा को हटाते हुए बहु-पक्षीय स्वैप की अनुमति दी।
- कुल 8 लोगों (4 डोनर और 4 प्राप्तकर्ता) की सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लगती है—भारत के चार अलग-अलग कोनों से आए चार परिवार, जो एक-दूसरे के लिए अजनबी थे, लेकिन एक ही दुखद परिस्थिति ने उन्हें साथ ला दिया। नागालैंड, कश्मीर, पंजाब और बिहार के इन परिवारों के पास एक ही समस्या थी: उनके प्रियजनों को किडनी ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत थी, लेकिन उनके अपने करीबी रिश्तेदार जैविक रूप से (biologically) उनके साथ मेल नहीं खा रहे थे।
जब रक्त समूह और इम्यूनोलॉजिकल मैचिंग (immunological matching) विफल हो गई, तो इन परिवारों ने एक साहसी निर्णय लिया। उन्होंने तय किया कि वे अपने प्रियजनों को किडनी देने के बजाय, किसी दूसरे अजनबी के प्रियजन को किडनी देंगे। इस प्रक्रिया को 'किडनी स्वैप' कहा जाता है, जहाँ डोनर A, प्राप्तकर्ता B को किडनी देता है, डोनर B, प्राप्तकर्ता C को, और यह श्रृंखला इस तरह चलती है कि अंत में सभी को जीवनदान मिल जाता है।
क्यों यह मामला इतना जटिल था?
किडनी स्वैप में जितनी अधिक जोड़ियाँ शामिल होती हैं, प्रक्रिया उतनी ही कठिन होती जाती है। एक चिकित्सा टीम को न केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक डोनर किसी न किसी प्राप्तकर्ता के साथ मेल खाता हो, बल्कि पूरी श्रृंखला (chain) को भी सही ढंग से बंद करना होता है। BozokMedia analysis shows कि इस तरह के जटिल मामलों में 'सेंसिटाइजेशन' (sensitisation) एक बड़ी चुनौती है, जहाँ प्राप्तकर्ता का शरीर डोनर की कोशिकाओं पर हमला कर सकता है।
डॉ. अनंत कुमार, जिन्होंने इस ऑपरेशन का नेतृत्व किया, ने बताया कि तीन-तरफा स्वैप को मैन्युअल रूप से प्रबंधित करना भी बेहद कठिन होता है, चार-तरफा स्वैप तो एक बड़ी चुनौती थी।
कानूनी बाधा और दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला
भारत के 'मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम' (THOTA) के तहत, ऑथोराइजेशन कमेटी ने पहले इस चार-तरफा स्वैप को खारिज कर दिया था। उनका तर्क था कि कानून केवल दो जोड़ों के बीच विनिमय की अनुमति देता है। हालांकि, 26 मई, 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए इस बाधा को हटा दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य विनिमय को रोकना नहीं, बल्कि उसे विनियमित करना है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि कानून में 'प्रथम डोनर' और 'द्वितीय डोनर' जैसे शब्दों का उपयोग केवल उदाहरण के लिए था, न कि जोड़ों की संख्या पर कोई कानूनी सीमा लगाने के लिए। इस फैसले ने चिकित्सा विज्ञान की प्रगति और कानून के बीच के अंतर को पाट दिया।
Frequently Asked Questions
1. किडनी स्वैप (Kidney Swap) क्या है?
जब एक डोनर अपने परिवार के सदस्य को किडनी नहीं दे पाता, तो वह किसी दूसरे डोनर-प्राप्तकर्ता जोड़े के साथ अपनी किडनी बदल लेता है ताकि दोनों परिवारों को जीवन मिल सके।
2. क्या भारत में किडनी स्वैप कानूनी है?
हाँ, दिल्ली हाई कोर्ट के हालिया फैसले के बाद, अब बहु-पक्षीय किडनी स्वैप कानूनी रूप से संभव है, बशर्ते इसमें कोई व्यावसायिक लेनदेन न हो।