भारत में खाद्य सुरक्षा नियामक (FSSAI) द्वारा पैकेज्ड फूड पर रंगीन चेतावनी लेबल लगाने के प्रस्ताव को छोड़ने के बाद एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। बड़ी खाद्य कंपनियों ने इन नियमों का कड़ा विरोध किया है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
- FSSAI ने पैकेज्ड फूड पर रंगीन चेतावनी लेबल लगाने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया है।
- बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (जैसे कोका-कोला और नेस्ले) ने इन लेबलिंग नियमों का कड़ा विरोध किया है।
- विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में 2050 तक 450 मिलियन लोग मोटापे का शिकार हो सकते हैं।
- यूरोप में खाद्य उत्पादों पर सख्त लेबलिंग है, जबकि भारत में नियम काफी ढीले हैं।
भारत में पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार में एक गहरा संकट उभर रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक, FSSAI, ने पैकेज्ड फूड के पैकेटों पर रंगीन चेतावनी लेबल (जैसे लाल रंग में उच्च चीनी या नमक की चेतावनी) लगाने के अपने पिछले प्रस्ताव को छोड़ दिया है। यह निर्णय उस समय आया है जब बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन नियमों के खिलाफ सक्रिय रूप से लॉबिंग कर रही थीं।
विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि वैश्विक कंपनियां भारत में अक्सर वही उत्पाद बेचती हैं जो उनके पश्चिमी देशों के संस्करणों से काफी अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, लंदन में बिकने वाले Fanta कैन में केवल 63 कैलोरी होती है, जबकि भारत में उसी ब्रांड के उत्पाद में तीन गुना अधिक चीनी हो सकती है। इतना ही नहीं, यूरोप में प्रतिबंधित कृत्रिम रंगों का उपयोग भारत में बिना किसी प्रमुख चेतावनी के किया जा रहा है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह केवल लेबलिंग का मामला नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से जुड़ा है। भारत में पैकेज्ड फूड बाजार लगभग $100 बिलियन का है, जिसमें से लगभग 80% उत्पाद उच्च वसा, चीनी और नमक (HFSS) से भरपूर हैं। यदि रंगीन चेतावनी लेबल लागू किए जाते हैं, तो अधिकांश पैकेट 'लाल झंडों' से भर जाएंगे, जो कंपनियों के मुनाफे को सीधे प्रभावित कर सकता है।
चेतावनी लेबल केवल सूचना नहीं हैं, वे उपभोक्ताओं को जीवन बदलने वाले निर्णय लेने में मदद करते हैं।
मार्च में हुई एक गोपनीय बैठक के दौरान, Coca-Cola जैसी कंपनियों के अधिकारियों ने तर्क दिया कि ऐसे लेबल भ्रामक हैं और भारतीय स्वाद की तीव्रता को नहीं समझते। कोका-कोला इंडिया की एक वरिष्ठ कार्यकारी ने यहाँ तक कहा कि ऐसे लेबल उपभोक्ताओं के व्यवहार को बदलने में सक्षम नहीं हैं। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि इन्हीं कंपनियों ने यूरोप के कई बाजारों में स्वेच्छा से 'ट्रैफिक लाइट' स्टाइल लेबल का उपयोग किया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत में खाद्य लेबलिंग के नियम 2017 से विकसित हो रहे हैं। FSSAI ने स्टार रेटिंग और रंग-कोडित चेतावनियों के कई प्रस्ताव पेश किए हैं, लेकिन उद्योग जगत के भारी दबाव के कारण अब केवल बैक-लेबल पर श्वेत-श्याम तालिका दिखाने का सुझाव दिया जा रहा है।
Frequently Asked Questions
1. FSSAI ने रंगीन लेबल लगाने का विचार क्यों छोड़ा?
उद्योग जगत के दबाव और यह तर्क देने के बाद कि भारतीय व्यंजनों में स्वाद अधिक तीव्र होता है, नियामक ने केवल ब्लैक-एंड-व्हाइट पोषण तालिका का प्रस्ताव दिया है।
2. क्या बड़ी कंपनियां भारत में अलग उत्पाद बेचती हैं?
हाँ, शोध बताते हैं कि कई कंपनियां स्थानीय नियमों और लागत कम करने के लिए पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक चीनी और कृत्रिम रंग वाले उत्पाद भारत में बेचती हैं।