एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों ने भारत में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (GI) बीमारियों, विशेष रूप से फैटी लिवर और कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताई है। डॉक्टरों ने इस मूक महामारी से निपटने के लिए समय पर जांच और जीवनशैली में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया है।
- एम्स के विशेषज्ञों ने भारत में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (GI) और लिवर रोगों से होने वाली मौतों को रोकने के लिए शुरुआती जांच पर जोर दिया है।
- नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) अब केवल मोटापे से नहीं जुड़ी है; खराब जीवनशैली और खान-पान इसके मुख्य कारण हैं।
- भारत पहली बार दिल्ली में 'वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी' की मेजबानी करने जा रहा है, जिसमें वैश्विक विशेषज्ञ शामिल होंगे।
भारत इस समय गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी) बीमारियों के एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। इसे देखते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के प्रमुख विशेषज्ञों ने देश में शुरुआती जांच (अर्ली डिटेक्शन) प्रोटोकॉल को तुरंत लागू करने की मांग की है। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब नई दिल्ली पहली बार प्रतिष्ठित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (WCOG) की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है। इस सम्मेलन में दुनिया भर से लगभग 3,000 प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
चिकित्सकों द्वारा पहचाने गए सबसे चिंताजनक रुझानों में से एक नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) और नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH) का चुपचाप बढ़ना है। पारंपरिक रूप से अत्यधिक शराब के सेवन से जुड़ी रहने वाली फैटी लिवर की बीमारी अब उन लोगों में भी पाई जा रही है जो शराब नहीं पीते हैं, जिनमें युवा और बच्चे भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सुस्त जीवनशैली, इंसुलिन प्रतिरोध और प्रसंस्कृत (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड) खाद्य पदार्थों से भरपूर आहार इस महामारी को बढ़ावा दे रहे हैं। कई मरीजों में इसके लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते जब तक कि बीमारी अंतिम चरण में नहीं पहुंच जाती।
लिवर की बीमारियों के अलावा, भारतीय उपमहाद्वीप में कोलोरेक्टल (आंत का) और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के मामलों में भी खतरनाक वृद्धि देखी जा रही है। किसी समय बुढ़ापे की बीमारी मानी जाने वाली कोलोरेक्टल कैंसर अब 20 और 30 साल के युवाओं में भी पाई जा रही है। इन बीमारियों का देर से पता चलना इलाज को बेहद कठिन बना देता है। डॉक्टरों का कहना है कि उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए कोलोनोस्कोपी और लिवर फंक्शन टेस्ट जैसी नियमित जांच सामान्य की जानी चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ऐतिहासिक रूप से, भारत का ध्यान मुख्य रूप से संक्रामक रोगों, दूषित पानी से होने वाली बीमारियों और कुपोषण पर था। हालांकि, पिछले तीन दशकों में आर्थिक उदारीकरण और तेजी से हुए शहरीकरण ने देश की स्वास्थ्य स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। पारंपरिक उच्च फाइबर वाले भारतीय भोजन की जगह अब कैलोरी से भरपूर फास्ट फूड ने ले ली है। इस बदलाव ने भारत को मेटाबॉलिक सिंड्रोम का केंद्र बना दिया है, जिससे पेट से जुड़ी पुरानी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में पेट और लिवर की बीमारियों का बढ़ता संकट न केवल एक स्वास्थ्य आपातकाल है, बल्कि एक गंभीर आर्थिक खतरा भी है। चूंकि युवा और कामकाजी आबादी इन बीमारियों की चपेट में आ रही है, इससे देश की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है और स्वास्थ्य प्रणाली पर अत्यधिक वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इसलिए, निवारक स्वास्थ्य अभियान अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन गए हैं।
"शुरुआती जांच ही एकमात्र ऐसा हथियार है जो हमारी युवा कार्यबल को चुपचाप नष्ट कर रही इस मूक महामारी से बचा सकता है," एम्स के एक वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट ने कहा।
| विशेषता | नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर (NAFLD) | अल्कोहलिक लिवर डिजीज (ALD) |
|---|---|---|
| मुख्य कारण | मेटाबॉलिक सिंड्रोम, मोटापा, खराब खान-पान | अत्यधिक शराब का सेवन |
| शुरुआती लक्षण | अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाई देते | थकान, पेट में हल्का दर्द या बेचैनी |
| भारत में स्थिति | तेजी से बढ़ रहा है, सामान्य वजन वाले लोगों में भी | विशिष्ट जनसांख्यिकी में लगातार उच्च दर |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या पतले लोगों को भी फैटी लिवर की बीमारी हो सकती है?
उत्तर 1: हां, इसे 'लीन एनएएफएलडी' (Lean NAFLD) कहा जाता है। यह आनुवंशिक कारणों, आंतरिक वसा (विसरल फैट) और खराब आहार के कारण सामान्य वजन वाले लोगों को भी प्रभावित कर सकता है।
प्रश्न 2: कोलोरेक्टल कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
उत्तर 2: इसके शुरुआती लक्षणों में मल त्यागने की आदतों में लगातार बदलाव, मल में खून आना, बिना किसी कारण के वजन कम होना और पेट में लगातार दर्द शामिल हैं।