टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के एक 26 वर्षीय छात्र की अचानक कार्डियक अरेस्ट से हुई मृत्यु ने कैंपस मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की खामियों को उजागर किया है। विशेषज्ञों ने युवाओं में बढ़ते हृदय रोगों पर चिंता जताते हुए CPR ट्रेनिंग और डिफाइब्रिलेटर की मांग की है।
- TISS के 26 वर्षीय छात्र की कार्डियक अरेस्ट से मौत, कैंपस में एम्बुलेंस और डिफाइब्रिलेटर की कमी रही।
- डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में हृदय संबंधी आपात स्थितियों में वृद्धि हुई है।
- सभी विश्वविद्यालयों में AED (ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफाइब्रिलेटर) और CPR प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाने की मांग।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के पब्लिक हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन के प्रथम वर्ष के छात्र पी. जनार्दनन की दुखद मृत्यु ने शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। देवनार कैंपस में कक्षा के दौरान सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद जनार्दनन बेहोश हो गए थे। हालांकि नजदीकी अस्पताल केवल 2.5 किलोमीटर दूर था, लेकिन कैंपस में एम्बुलेंस या डिफाइब्रिलेटर (जो हृदय की विद्युत तरंगों को रीसेट करता है) की अनुपलब्धता के कारण उन्हें कार से ले जाया गया, जिससे कीमती समय बर्बाद हुआ।
जेन मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के निदेशक डॉ. रॉय पाटनकर के अनुसार, अस्पताल पहुँचने में लगभग 30 मिनट लग गए। उन्होंने बताया कि कार्डियक इमरजेंसी में शुरुआती कुछ मिनट जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करते हैं। यदि संस्थान में लोग CPR (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) में प्रशिक्षित होते और AED उपलब्ध होता, तो परिणाम कुछ और हो सकते थे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि शैक्षणिक संस्थान डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फायर सेफ्टी पर तो करोड़ों खर्च करते हैं, लेकिन जैविक आपात स्थितियों (Biological Emergencies) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। TISS की यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि संस्थागत लापरवाही का संकेत है। जब छात्र अपना अधिकांश समय कैंपस में बिताते हैं, तो वहां बुनियादी आपातकालीन चिकित्सा सुविधा का होना अनिवार्य है।
"प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में डिफाइब्रिलेटर उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जैसे कि अग्निशामक यंत्र (fire extinguishers) और अन्य अग्नि सुरक्षा उपकरण होते हैं।"
डॉ. पाटनकर ने एक चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा किया है। पिछले पांच वर्षों में, 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में हृदय संबंधी आपात स्थितियों के मामले तेजी से बढ़े हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई मरीजों को मधुमेह, उच्च रक्तचाप या धूम्रपान जैसी कोई पारंपरिक बीमारी नहीं थी।
जनता के लिए 'हार्ट अटैक' और 'कार्डियक अरेस्ट' के बीच के अंतर को समझना जरूरी है। हार्ट अटैक तब होता है जब हृदय के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाता है, जबकि कार्डियक अरेस्ट तब होता है जब हृदय अचानक धड़कना बंद कर देता है। दोनों ही स्थितियों में त्वरित पहचान और उपचार अत्यंत आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली—जैसे गतिहीन दिनचर्या, खराब खान-पान और नींद की कमी—युवाओं के हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। अत्यधिक तनाव और काम के घंटों के बाद भी डिजिटल उपकरणों के माध्यम से काम से जुड़े रहना शरीर को निरंतर तनाव की स्थिति में रखता है, जो जोखिम को बढ़ाता है।
| विशेषता | हार्ट अटैक (Heart Attack) | कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) |
|---|---|---|
| प्रकृति | रक्त प्रवाह की समस्या (ब्लॉकज) | विद्युत समस्या (धड़कन रुकना) |
| लक्षण | सीने में दर्द, दबाव, मतली | अचानक बेहोशी, पल्स का न होना |
| तत्काल आवश्यकता | अस्पताल में भर्ती | CPR और डिफाइब्रिलेशन (AED) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या 20 की उम्र में स्वस्थ व्यक्ति को हार्ट अटैक आ सकता है?
हाँ। आनुवंशिक स्थितियाँ (जैसे familial hypercholesterolaemia), अत्यधिक तनाव और संरचनात्मक हृदय दोष बिना किसी पारंपरिक जोखिम कारक के भी अटैक का कारण बन सकते हैं।
प्रश्न 2: CPR की तुलना में डिफाइब्रिलेटर अधिक प्रभावी क्यों है?
CPR मस्तिष्क तक रक्त पहुँचाने में मदद करता है, लेकिन डिफाइब्रिलेटर एक इलेक्ट्रिक शॉक के जरिए हृदय की धड़कन को वापस सामान्य लय में लाने की क्षमता रखता है।