केरल के वेंगोला के पी के नारायणन, जो अब कुछ ही बचे कलाकारों में से एक हैं, अपनी मौखिक परम्परा को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शहरीकरण और सामाजिक बदलावों ने इस प्राचीन कथा कला को अस्तित्व के किनारे पर ला दिया है।
मुख्य बिंदु
- रवेली पट्टु के कलाकार घट रहे हैं, केवल पी के नारायणन सक्रिय हैं।
- प्रकाशन, आर्थिक दबाव और शहरीकरण ने इस परम्परा को खतरे में डाल दिया है।
- शोधकर्ता इस कला को दस्तावेज़ करने और संरक्षित करने की वकालत कर रहे हैं।
रवेली पट्टु क्या है?
रवेली पट्टु, जिसे ब्लावे ली पट्टु भी कहा जाता है, केरल के एर्नाकुलम क्षेत्र में कार्कडाकम महीने के दौरान प्रस्तुत किया जाने वाला एक मौखिक कथा‑कला रूप है। यह कला वीरसाईवा समुदाय द्वारा संधारित है, जो सदियों पहले आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु से प्रवासित हुए थे। कलाकार छोटे‑छोटे चित्रों से सजे स्क्रॉल लेकर घर‑घर जाकर शिवार्ताओं को गाते हैं, और बदले में स्थानीय लोग चावल, नारियल या नगद का भेंट देते हैं।
संकट की ओर बढ़ता मार्ग
शहरीकरण और बदलते सामाजिक‑आर्थिक परिदृश्य ने इस परम्परा के लिए मंच घटा दिया है। अब केवल पी के नारायणन (उम्र ७२) ही इस कला को जीवित रख सकते हैं, और वह भी केवल अनुरोध पर। वह बताते हैं, “गीत का कोई लिखित लिपि नहीं है; मैंने इसे केवल सुनकर सीखा है।” उनका मानना है कि उनके तीन बच्चों में से कोई भी इस विरासत को आगे नहीं लेगा।
शोध एवं दस्तावेज़ीकरण का प्रयास
मालयालम के प्रोफ़ेसर सजिता जी ने 2001 में अपनी एमफ़िल थीसिस में रवेली पट्टु को चुना, क्योंकि यह जीवंत कथा‑कला का एक दुर्लभ उदाहरण है। उन्होंने कहा, “यह कला समय की कसौटी पर खरी उतरी है, इसे दस्तावेज़ करना अत्यावश्यक है।” उनके शोध में पाया गया कि पहले स्क्रॉल मुल कपड़े, चावल के घोल और हल्दी से कड़े होते थे, जबकि अब रेक्सीन या पीवीसी शीट्स पर मार्कर से चित्र बनते हैं।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that preserving रवेली पट्टु not only safeguards Kerala’s intangible heritage but also offers scholars insight into ancient Malayalam oral traditions and their socio‑economic roles during monsoon months.
“रवेली पट्टु जैसी मौखिक परम्पराएँ सांस्कृतिक पहचान की धरोहर हैं; उनका नाश हमारे इतिहास के धुंधले होने का संकेत है।” – डॉ. अन्ना मेनन, सांस्कृतिक वैज्ञानिक
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या रवेली पट्टु को स्कूल या विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है?
उत्तर: वर्तमान में कोई औपचारिक पाठ्यक्रम नहीं है, लेकिन कुछ विश्वविद्यालयों में शोध‑प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
प्रश्न 2: इस कला को बचाने के लिए कौन‑सी पहल की जा रही है?
उत्तर: स्थानीय NGOs और शैक्षणिक संस्थान स्क्रॉल की डिजिटल अभिलेख बनाने और युवा कलाकारों को प्रशिक्षण देने की कोशिश कर रहे हैं।