ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने ईरान की परमाणु हमले की क्षमता को समाप्त करने को वैध बताया और कहा कि क्षेत्रीय संघर्ष के नए चरण में प्रवेश करना आश्चर्यजनक नहीं है। उन्होंने इंडो‑पैसिफिक रणनीति में भारत की भागीदारी को अधिकतम करने की आवश्यकता पर बल दिया।

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधान मंत्री स्कॉट मॉरिसन ने हाल ही में इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र की रणनीतिक दिशा पर गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हमले की क्षमता से वंचित करना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम है, और यह कार्रवाई केवल निरपेक्ष नहीं बल्कि वैध है। मॉरिसन ने इस बात को दोहराते हुए कहा कि इस क्षेत्र में चल रहे संघर्षों के अब नया चरण शुरू हो चुका है, जिसका वह आश्चर्य नहीं जताते।

इंडो‑पैसिफिक में "इंडो" की आवश्यकता

मॉरिसन ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि भारत को इंडो‑पैसिफिक रणनीति में "इंडो" शब्द को जोड़ने की आवश्यकता है। उनका तर्क है कि भारत केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि सुरक्षा, नौवहन और तकनीकी सहयोग में प्रमुख खिलाड़ी है। इस दृष्टिकोण से ऑस्ट्रेलिया-भारत द्विपक्षीय संबंधों को पुनः परिभाषित करने की संभावना उत्पन्न होती है, जिससे चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सके।

ईरान की परमाणु क्षमताओं पर अंतरराष्ट्रीय दबाव

वर्षों से ईरान की परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तनाव बना हुआ है। मॉरिसन ने इस पर बल दिया कि यदि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति दी गई, तो वह क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल सकता है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और प्रमुख पश्चिमी देशों को मिलकर इस खतरे को रोकना चाहिए, जिससे मध्य पूर्व में नई सशस्त्र प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके।

क्षेत्रीय संघर्ष का नया चरण

मॉरिसन ने यह भी इंगित किया कि हालिया संघर्ष—विशेषकर मध्य पूर्व में उभरे तनाव—एक नई सक्रिय अवस्था में प्रवेश कर चुका है। उनका मानना है कि इस बदलाव को नज़रअंदाज़ करना असंभव है, और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को तेज़ी से पुनः संरेखित करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएगा, चाहे वह शांति वार्ता हो या मानवीय सहायता।

निष्कर्ष और आगे की राह

प्रस्तावित "इंडो" शब्द को इंडो‑पैसिफिक एजेंडा में सम्मिलित करना, भारत को सुरक्षा साझेदार के रूप में मान्यता देना, तथा ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित करने के लिए कूटनीतिक कदम उठाना—इन सभी बिंदुओं पर मॉरिसन का दृष्टिकोण भविष्य में ऑस्ट्रेलिया की विदेश नीति को पुनः आकार देगा। इस बदलाव के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निकट सहयोग की आवश्यकता होगी।