ईरान‑अमेरिका तनाव के बीच इज़राइल ने दुबारा सैन्य कार्रवाई की तैयारी जताई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की स्वीकृति का इंतज़ार कर रहे हैं, जबकि आईडीएफ ने अभी सीधे संघर्ष में प्रवेश नहीं करने की घोषणा की है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- इज़राइल ईरान के खिलाफ संभावित अमेरिकी सैन्य अभियान में भाग लेने के लिए तैयार है।
- नेतन्याहू ट्रम्प के स्पष्ट ‘OK’ का इंतज़ार कर रहे हैं।
- आईडीएफ ने अभी तक सीधे युद्ध में प्रवेश न करने की रणनीति अपनाई है, लेकिन पूरी तैयारी जारी है।
पृष्ठभूमि
ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव पिछले दो दशकों में कई बार तेज़ हुआ है, विशेषकर हर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग सुरक्षा को लेकर। 2015 का इरानी परमाणु समझौता (JCPOA) टूटने के बाद, अमेरिकी प्रशासन ने आर्थिक प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया और क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी। इस माहौल में इज़राइल ने हमेशा ईरान को एक रणनीतिक खतरे के रूप में देखा है, क्योंकि टेह्रान द्वारा परमाणु कार्यक्रम और लेबनान के हेzbollah के साथ सहयोग को वह अस्वीकार नहीं कर सकता।
वर्तमान स्थिति
10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, इज़राइल की रक्षा शक्ति (IDF) ने कहा है कि वह किसी भी स्थिति के लिये पूरी तरह तैयार है, परन्तु अभी तक अमेरिकी‑ईरानी टकराव में सीधे भाग लेने की योजना नहीं है। एक इज़राइली अधिकारी ने कहा, “जरूरत पड़ी तो हम फिर कार्रवाई करेंगे, जैसा कि हमने पहले भी अमेरिका के साथ मिलकर किया है।” इस बयान के साथ ही इज़राइल के वरिष्ठ अधिकारी इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि वे ट्रम्प प्रशासन के स्पष्ट आदेश की प्रतीक्षा में हैं।
संभावित परिणाम
यदि वॉशिंगटन ट्रम्प राष्ट्रपति द्वारा इज़राइल को ‘OK’ दिया जाता है, तो दो प्रमुख परिदृश्य उभर सकते हैं। पहला, संयुक्त अमेरिकी‑इज़राइली हवाई और समुद्री बलों द्वारा हर्मुज में ईरानी नौसैनिक इकाइयों पर प्रीकॉर्सिव स्ट्राइक, जिससे तेल शिपिंग पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। दूसरा, इज़राइल के द्वारा जमीनी या विशेष बलों के माध्यम से ईरान के परमाणु सुविधाओं पर लक्षित हमले, जिससे मध्य पूर्व में व्यापक सैन्य प्रतिक्रिया का जोखिम बढ़ेगा। दोनों ही स्थितियों में क्षेत्रीय गठबंधनों – विशेषकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की – की प्रतिक्रियाएँ नई जटिलता जोड़ेंगी।
विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉ. अंजली मेहरा का मानना है कि “इज़राइल का यह कदम केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। वह ट्रम्प प्रशासन को दिखाना चाहता है कि वह मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों का भरोसेमंद साथी बना रहेगा।” वहीं, अमेरिकी सुरक्षा विश्लेषक जॉन रिवर्स ने चेतावनी दी है कि “बिना स्पष्ट वैधता के किसी भी सैन्य हस्तक्षेप से ईरान के प्रतिद्वंद्वी समूहों को और अधिक सशक्त किया जा सकता है, जिससे दीर्घकालिक अस्थिरता बढ़ेगी।”
अंत में, यह स्पष्ट है कि इज़राइल की तैयारी, अमेरिकी स्वीकृति पर निर्भर है, और इस निर्णय का प्रभाव न केवल इज़राइल‑ईरान संबंधों पर, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ेगा।