एनएटीओ ने अंकारा में आयोजित शिखर सम्मेलन में 5% जीडीपी रक्षा खर्च का नया मानक अपनाया। वर्तमान में केवल लिथुआनिया और एस्टोनिया इस लक्ष्य को पूरा कर रहे हैं, जो पूर्वी सीमा की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एनएटीओ ने 5% जीडीपी रक्षा खर्च का नया लक्ष्य अपनाया
- केवल लिथुआनिया और एस्टोनिया वर्तमान में इस लक्ष्य को पूरा कर रहे हैं
- नया मानक पूर्वी धारा की सुरक्षा और गठबंधन की समरूपता को प्रभावित करेगा
अंकारा में आयोजित एनएटीओ शिखर सम्मेलन में, गठबंधन के प्रमुख नेताओं ने 5% जीडीपी को रक्षा खर्च का नया बेंचमार्क निर्धारित किया। यह लक्ष्य पिछले दशकों से चल रहे 2% लक्ष्य से कई गुना अधिक है और सदस्य देशों पर अपने बजट को तेज़ी से बढ़ाने का दबाव डालता है।
इतिहास और मौजूदा लक्ष्य
एनएटीओ ने 2006 में 2% जीडीपी को रक्षा खर्च के न्यूनतम मानक के रूप में स्थापित किया, जो तब के आर्थिक परिस्थितियों और सुरक्षा जरूरतों को प्रतिबिंबित करता था। समय के साथ, रूसी सैन्य गतिविधियों में वृद्धि और यूरोपीय पूर्वी सीमाओं की अस्थिरता ने सदस्य देशों से अधिक निवेश की माँग बढ़ा दी। इस नई पहल का उद्देश्य गठबंधन की तत्परता और प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना है।
पूर्वी धारा पर सदस्य देशों की स्थिति
लिथुआनिया और एस्टोनिया, दोनों ही बाल्टिक राष्ट्र, वर्तमान में 5% जीडीपी से अधिक रक्षा खर्च कर रहे हैं। उनका उच्च स्तर का निवेश नाटो की पूर्वी सीमा के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है, विशेषकर रूस के संभावित आक्रमण के संदर्भ में। इन देशों की आर्थिक क्षमता सीमित होने के बावजूद, वे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस लक्ष्य को हासिल कर रहे हैं।
सदस्य देशों की प्रतिक्रिया
अधिकांश यूरोपीय सदस्य, विशेषकर जर्मनी, फ्रांस और इटली, बजट प्रतिबंधों और आर्थिक अस्थिरता के कारण अभी तक 5% लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाए हैं। कई ने इस नई मांग को “आर्थिक बोझ” के रूप में वर्णित किया, जबकि कुछ ने इसे “सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम” कहा। इस विभाजन से गठबंधन के भीतर बजट नीति पर चर्चा की तीव्रता बढ़ने की संभावना है।
भविष्य की दिशा
5% लक्ष्य की घोषणा नाटो के सामरिक दिशा-निर्देश में एक स्पष्ट परिवर्तन दर्शाती है, जो रूसी सैन्य विस्तार के प्रति अधिक दृढ़ प्रतिक्रिया का संकेत देती है। यदि सदस्य देश इस मानक को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो गठबंधन की एकता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं। इस संदर्भ में, भविष्य के शिखर सम्मेलनों में बजट अनुपालन और सामरिक सहयोग के बीच संतुलन बनाना प्रमुख चुनौती रहेगा।