चीन के तिब्बत में बन रहे ब्रह्मपुत्र (यर्लुंग त्सांग्पो) बाँध के नीचे एक सक्रिय fault की पहचान की गई है, जिससे ढाँचे की स्थिरता और भारत‑चीनी सीमा के निकट पड़ोसी क्षेत्रों की सुरक्षा पर नई चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं। यह शोध चीन के आधिकारिक भू‑विज्ञान सर्वेक्षण द्वारा समर्थित है और अंतर‑राष्ट्रीय चर्चा को भड़काता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- ब्रह्मपुत्र बाँध के नीचे Paizhen Fault सक्रिय पाया गया
- स्थिरता‑संबंधी जोखिमों से भारत‑चीनी सीमा क्षेत्र में संभावित खतरा
- चीन के सुरक्षा आश्वासनों पर अंतर‑राष्ट्रीय दबाव बढ़ा
चीन के तिब्बत में स्थित विशाल ब्रह्मपुत्र (यर्लुंग त्सांग्पो) जलविद्युत परियोजना के नीचे एक सक्रिय fault का अस्तित्व अब वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से पुष्टि हो गया है। यह खोज, चीन के राज्य‑स्वामित्व वाले China Geological Survey द्वारा समर्थित टीम ने की, जिसमें चेंगडू यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और मध्य यर्लुंग ज़ांग्बो नदी अनुसंधान स्टेशन के भू‑वैज्ञानिक शामिल थे।
पृष्ठभूमि और अध्ययन की प्रमुख बातें
दिसंबर 2024 में चीन ने इस परियोजना को सुरक्षित तथा पर्यावरण‑सुरक्षित बताकर आश्वासन दिया था, जबकि इस बाँध का अनुमानित निर्माण लागत 167.8 बिलियन डॉलर और वार्षिक बिजली उत्पादन 300 अरब किलावाट‑घंटे बताया गया है। लेकिन दक्षिणी चीन मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, Paizhen Fault, जो प्लायस्टोसिन युग से सक्रिय है, ने आस‑पास की चट्टानों को फाड़ दिया है, जिससे जलाशय के बुनियादी ढाँचे, बाँध, पुल और टनल जैसी संरचनाएँ नाज़ुक हो गई हैं।
भू‑वैज्ञानिक जोखिम और संभावित प्रभाव
फॉलबंधी क्षेत्र में 2017 में मिलिन में 6.9 रिच्टर की भूकंप घटना, इस fault की निरंतर सक्रियता का स्पष्ट प्रमाण है। शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि सतत भूकंपीय गतिविधि के कारण ढलानों में भू-स्खलन और ढहाव की संभावना बढ़ सकती है, जिससे न केवल इंजीनियरिंग संरचनाएँ बल्कि मानव जीवन भी खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने पहाड़ी ढलानों को सुदृढ़ करने और रिटेनिंग स्ट्रक्चर स्थापित करने की सिफारिश की है।
राजनीतिक और कूटनीतिक आयाम
बाँध तिब्बती सीमा से कुछ ही किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश में स्थित है, जहाँ भारत‑चीनी जल‑संसाधन संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। चीन के आधिकारिक बयान के विपरीत, इस नई वैज्ञानिक रिपोर्ट से भारत में जल‑सुरक्षा के बारे में नई बहस छिड़ गई है। अंतर‑राष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे को देख रहा है, क्योंकि किसी भी बड़ी जल‑बाँध की अस्थिरता से नीचे-नदी देशों—बांग्लादेश और भारत—पर जल‑प्रवाह, बाढ़ और जल‑स्रोत की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को इस शोध को गंभीरता से लेना चाहिए और परियोजना के डिज़ाइन को पुनः‑मूल्यांकन करना चाहिए। साथ ही, भारत को भी अपनी सीमा‑नजदीकी जल‑सुरक्षा रणनीतियों को अद्यतन करने की जरूरत है, जिससे दोनों देशों के बीच पारदर्शी संवाद स्थापित हो सके। इस प्रकार, इस सक्रिय fault की खोज न केवल एक तकनीकी चुनौती है, बल्कि भारत‑चीन संबंधों में नई जटिलता भी जोड़ती है।