पाकिस्तान और सऊदी अरब ने US‑ईरान के बढ़ते तनाव को लेकर गहरी चिंता जताई, कहा कि इस्लामाबाद समझौता क्षेत्रीय शांति को नहीं बचा पाएगा। यह बात विदेश मंत्री ईशाक दार और सऊदी प्रतिनिधि के बीच हुई टेलीफ़ोन वार्ता में स्पष्ट हुई।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- US‑ईरान तनाव में नई वृद्धि
- इसलामाबाद समझौता क्षेत्रीय शांति में विफल
- पाकिस्तान‑सऊदी ने कूटनीतिक मध्यस्थता को तेज किया
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ईशाक दार और सऊदी अरब के राजकुमार फैसल बिन फ़रहान के बीच शनिवार को हुए टेलीफ़ोन वार्ता में दोनों देशों ने पश्चिम एशिया में बढ़ते यूएस‑ईरान टकराव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। यह वार्ता तब हुई जब दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि मौजूदा तनाव क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रहा है, चाहे उन्होंने 18 जून को हस्ताक्षरित इस्लामाबाद समझौता (MoU) किया हो।
पृष्ठभूमि: यूएस‑ईरान संबंधों की जटिलता
अमेरिका और ईरान के बीच संबंध दशकों से ही तनावपूर्ण रहे हैं, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्ष और समुद्री सुरक्षा के मुद्दे प्रमुख रहे हैं। 2024‑2025 में दोबारा बढ़ते शत्रुता के बाद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मध्यस्थता को बढ़ावा देने के लिए कई कूटनीतिक पहलें शुरू कीं, जिनमें स्विट्ज़रलैंड में तकनीकी‑स्तर की बातचीत भी शामिल थी। इन प्रयासों के मध्य, 18 जून को इस्लामाबाद समझौता हुआ, जिसका उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच संवाद को पुनर्स्थापित करना और संघर्ष को रोकना था।
इसलामाबाद समझौते की सीमाएँ
हालांकि इस समझौते ने एक आशावादी स्वर दिया, लेकिन सतत विस्फोटक घटनाएँ—जैसे यूएस के दक्षिण‑पश्चिम एशिया में नौसैनिक अभ्यास और ईरान द्वारा प्रतिवादी मिसाइल परीक्षण—समझौते की प्रभावशीलता को कमजोर कर रही हैं। पाकिस्तान और क़तर ने मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, दोनों पक्षों को अधिकतम संयम बरतने की अपील की, परंतु वास्तविक जमीन पर तनाव का स्तर घट नहीं पाया।
पाकिस्तान‑सऊदी की कूटनीतिक पहल
वार्ता के दौरान दार ने कहा कि सभी पक्षों को “अधिकतम संयम” बरतना चाहिए और “मध्यस्थता प्रयासों को पर्याप्त समय और स्थान” देना चाहिए। सऊदी विदेश मंत्री ने भी समान विचारधारा दोहराते हुए, निरंतर संवाद और डि‑एस्केलेशन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। यह दो देशों की सामूहिक आवाज़, जो दोनों ही क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रमुख हितधारक हैं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांतिपूर्ण समाधान की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भविष्य की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
यदि इस तरह की कूटनीतिक संवाद जारी रहा, तो यूएस‑ईरान टकराव को सीमित करने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, दोनों महान शक्तियों के रणनीतिक हितों में गहरी असहमति और मध्य‑पूर्व में विभिन्न प्रॉक्सी समूहों की सक्रियता इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और सऊदी की मध्यस्थता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे किस हद तक दोनों पक्षों को “संयुक्त रणनीतिक ढाँचा” बनाने के लिए मान्य कराते हैं।