ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज में 20% शुल्क की मांग को कठोर शब्दों में खारिज कर दिया। वह इसे ‘बहुत अधिक’ और ‘अन्यायपूर्ण’ बताते हुए, अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर संभावित असर की चेतावनी दी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- ट्रम्प ने स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज पर 20% शुल्क प्रस्तावित किया।
- इरान ने इस शुल्क को अत्यधिक और अनुचित कहा।
- भविष्य में क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक तेल कीमतों पर असर पड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज के पार गुजरने वाले जहाज़ों पर 20% शुल्क लागू करने की योजना का विवरण साझा किया। यह प्रस्ताव, जो तेल निर्यात पर निर्भर कई देशों के लिये आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है, अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के साथ टकराव में है।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज विश्व के सबसे रणनीतिक जलमार्गों में से एक है, जहाँ से लगभग 20% वैश्विक तेल प्रतिदिन गुजरता है। 1979 के इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना रहा है, और पिछले दशकों में इस जलमार्ग को अक्सर राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। 2019 में ईरान-यूएस जहाज़ों के बीच टक्कर के बाद कई बार इस जलमार्ग को बंद करने की धमकी दी गई थी।
ट्रम्प की नई शुल्क मांग
ट्रम्प ने बताया कि यह 20% शुल्क “सुरक्षा लागत” और “इज़राइल के खतरे” को कवर करने के लिये आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह कदम “सभी देशों को समान रूप से लागू होगा” और “समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देगा”। यह प्रस्ताव, विशेषकर तेल निर्यातकों और शिपिंग कंपनियों के लिये एक बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है, जो पहले से ही ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी देख रहे हैं।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान के विदेश मंत्री अरघची ने तुरंत इस प्रस्ताव की निंदा की, कहा कि “20% शुल्क बहुत अधिक है, हम इसे न्यायसंगत नहीं मानते।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि यह शुल्क लागू हुआ तो ईरान अपने टैंकों को वैकल्पिक मार्गों से भेजने या अपने तेल की कीमतें बढ़ाने पर विचार कर सकता है। इरान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों में इस शुल्क को “अवैध” और “असमान” घोषित करने की घोषणा की है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि ट्रम्प की योजना लागू होती है, तो यह न केवल ईरान-यूएस संबंधों को और बिगाड़ेगी, बल्कि ग्लोबल तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के शुल्क से तेल की कीमतों में उछाल और शिपिंग रूट्स में बदलाव हो सकता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब इस प्रस्ताव पर बहस करने और संभावित समाधान खोजने की आवश्यकता है।