पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा कि इरान-यूएस शांति समझौता अब टूट चुका है और डोनाल्ड ट्रम्प खुद की बनाई हुई जाल में फँस गया है। उन्होंने ट्रम्प प्रशासन की रणनीतिक कमी और हॉर्मुज जलडमरमर की महत्त्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- इंटीरिम शांति समझौता टूट गया
- ट्रम्प की रणनीति में गंभीर कमी
- हॉर्मुज जलडमरमर भविष्य में बढ़ते तनाव का संकेत
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भारत टुडे के राजदीप सरदेई के साथ एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और इरान के बीच का शांति समझौता (MOU) अब “मृत” हो चुका है और हॉर्मुज जलडमरमर की घटनाओं ने अमेरिकी योजना की खामियों को उजागर किया है।
समझौते की निरर्थकता
बोल्टन के अनुसार, इस समझौते को केवल इरान के नागरिक नेतृत्व, यानी संसद स्पीकर और विदेश मंत्री के साथ बातचीत करके तैयार किया गया, जबकि वास्तविक शक्ति इंस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉरपोरेशन (IRGC) के पास है, जो मिसाइल, नौसेना और ड्रोन का नियंत्रण रखती है। इस कारण, शांति समझौता रणनीतिक रूप से निरर्थक रहा।
हॉर्मुज जलडमरमर की रणनीतिक महत्ता
हॉर्मुज जलडमरमर को विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोक पॉइंट में से एक माना जाता है। बोल्टन ने सवाल किया कि ट्रम्प प्रशासन ने इस जलडमरमर को क्यों नहीं पहचाना, जबकि जियोपॉलिटिकल मानचित्र पर यह स्पष्ट है। उन्होंने उल्लेख किया कि पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 की क्रांति के बाद ही इस संभावित बंदी पर contingency plans तैयार किए थे।
ट्रम्प की रणनीतिक त्रुटियां
बोल्टन का मुख्य आरोप यही है कि ट्रम्प ने बिना स्पष्ट लक्ष्य के ही इस संघर्ष को आरम्भ किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी जनता को तैयार नहीं किया गया, मित्र राष्ट्रों के साथ समन्वय नहीं किया गया और दीर्घकालिक रणनीति की कमी थी। घरेलू राजनीति, विशेषकर तेल के दामों को घटाकर रिपब्लिकन पार्टी के चुनावी लाभ को देखना, ने इस समझौते को आकार दिया।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि शांति समझौता विफल हो चुका है, तो मध्य पूर्व में फिर से युद्ध की स्थिति उभर सकती है। बोल्टन ने चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट उद्देश्यों के, यूएस की आगे की कार्रवाई केवल क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसी भी संभावित परिवर्तन को तभी सफल माना जा सकता है जब इरान के भीतर वैकल्पिक राजनीतिक ढांचे को सुदृढ़ किया जाए, न कि केवल सैन्य बल के प्रयोग से।