अमेरिकी सेना ने ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रेटर टुनब द्वीप पर हमला किया है, जिससे फारस की खाड़ी में तनाव चरम पर पहुंच गया है। यह हमला होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के बीच हुआ है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • अमेरिकी सेना (CENTCOM) ने ईरान के ग्रेटर टुनब द्वीप पर लक्षित हमला किया।
  • यह हमला होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास रणनीतिक नियंत्रण के लिए किया गया।
  • ग्रेटर टुनब को ईरान का 'अजेय विमानवाहक पोत' (Unsinkable Aircraft Carrier) माना जाता है।
  • अमेरिका ने ईरान पर प्रभावी नौसैनिक नाकाबंदी लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

फारस की खाड़ी में भू-राजनीतिक तनाव एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बुधवार को ईरान के नियंत्रण वाले ग्रेटर टुनब (Greater Tunb) द्वीप पर एक सटीक हमला किया। यह हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर वर्चस्व की लड़ाई है।

रणनीतिक महत्व: ईरान का 'अजेय विमानवाहक पोत'

विशेषज्ञों और चीनी शोधकर्ताओं के अनुसार, ग्रेटर टुनब और उसके आसपास के द्वीप जैसे अबू मूसा और लेसर टुनब, ईरान के लिए एक 'आर्क डिफेंस' (Arch Defence) प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं। ईरान इन द्वीपों को अपने 'अजेय विमानवाहक पोत' (Unsinkable Aircraft Carriers) के रूप में देखता है, क्योंकि यहाँ से वे समुद्री यातायात और सैन्य गतिविधियों पर पूर्ण नियंत्रण रख सकते हैं। यदि अमेरिका इन द्वीपों पर नियंत्रण या प्रभाव स्थापित कर लेता है, तो वह सीधे तौर पर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त कर लेगा।

नाकाबंदी और सैन्य टकराव का नया अध्याय

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देशानुसार, अमेरिकी सेना ने ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी को फिर से लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी बलों ने नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश कर रहे दो वाणिज्यिक जहाजों को भी बीच में ही रोक दिया। यह कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी शुरू होने के मात्र 17 घंटों के भीतर की गई है।

क्षेत्रीय विवाद और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ग्रेटर टुनब का मुद्दा केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं है, बल्कि इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का भी दावा शामिल है। 1971 में ईरान ने इन द्वीपों पर नियंत्रण कर लिया था, जिसे तब संयुक्त अरब अमीरात का हिस्सा बनने वाला था। इस ऐतिहासिक विवाद ने इस क्षेत्र को हमेशा से ही बारूद के ढेर पर बिठाए रखा है। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी हमलों ने ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत में 388वीं मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री ब्रिगेड के बैरक को भी निशाना बनाया है, जो टैंक और बख्तरबंद वाहनों के संचालन के लिए जिम्मेदार है।