यूरोपीय संघ ने अपने उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) में बड़े सुधारों की घोषणा की है, जिससे कार्बन-गहन अर्थव्यवस्थाओं और पर्यावरण समर्थकों के बीच राजनीतिक खींचतान बढ़ गई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- यूरोपीय संघ ने अपने दो दशक पुराने उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) में सुधारों का अनावरण किया है।
- यह सुधार औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और उच्च ऊर्जा लागतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।
- इटली और पोलैंड जैसे देशों के दबाव के कारण कंपनियों को उत्सर्जन नियमों में कुछ छूट मिल सकती है।
- स्पेन और नॉर्डिक देशों ने इन सुधारों का कड़ा विरोध किया है।
ब्रसेल्स: यूरोपीय संघ (EU) ने शुक्रवार को अपने कार्बन बाजार में व्यापक सुधारों की घोषणा की है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। दो दशक पुराने उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) में यह बदलाव यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के बीच एक राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है।
आर्थिक दबाव बनाम जलवायु लक्ष्य
यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के दूसरे कार्यकाल के दौरान, यूरोपीय संघ का रुख थोड़ा अधिक 'व्यापार-अनुकूल' होता दिख रहा है। अमेरिका और चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच, ब्रसेल्स पर भारी दबाव है कि वह अपने उद्योगों को सुरक्षित रखे। विशेष रूप से इटली, पोलैंड और चेक गणराज्य जैसे देशों को संतुष्ट करने के लिए, आयोग कंपनियों को उत्सर्जन नियमों में अधिक लचीलापन (wiggle room) देने पर विचार कर रहा है।
क्या है उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS)?
2005 से लागू, ETS का उद्देश्य बिजली उत्पादकों और स्टील, सीमेंट एवं रसायन जैसे भारी उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है। इस प्रणाली के तहत, कंपनियों को उनके द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों के लिए भुगतान करना पड़ता है। कार्बन डाइऑक्साइड की प्रति टन कीमत वर्तमान में लगभग 80 यूरो है। जैसे-जैसे लक्ष्य सख्त होते हैं, उत्सर्जन परमिट की संख्या कम कर दी जाती है ताकि कंपनियां प्रदूषण कम करने के लिए प्रेरित हों।
विभाजित यूरोप: समर्थक बनाम विरोधी
इन सुधारों ने यूरोप को दो गुटों में बांट दिया है। एक तरफ स्पेन और स्कैंडिनेवियाई देश हैं, जो जलवायु लक्ष्यों के साथ समझौता करने के खिलाफ हैं। दूसरी ओर, जर्मनी का रासायनिक क्षेत्र और अन्य कार्बन-गहन उद्योग हैं, जो तर्क देते हैं कि ETS के कारण बिजली की कीमतें बढ़ रही हैं और यूरोपीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो कंपनियां पहले ही डीकार्बोनाइजेशन में निवेश कर चुकी हैं, उनके लिए नियमों में ढील देना उनके प्रतिस्पर्धी लाभ को नुकसान पहुंचा सकता है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
यूरोपीय संघ अब 2040 तक नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने का लक्ष्य भी रख रहा है। हालांकि, सड़क परिवहन और भवन हीटिंग पर कार्बन मूल्य निर्धारण (ETS 2) को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है, जिसे पोलैंड और हंगरी जैसे देशों के अनुरोध पर पहले ही टाल दिया गया है।