सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव फिर से बढ़ गया है। जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा चिंताओं के बीच जल संसाधनों के प्रबंधन पर दोनों देशों के रुख में भारी अंतर देखा जा रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सिंधु जल संधि (1960) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से गतिरोध पैदा हुआ है।
  • भारत जलवायु परिवर्तन और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के कारण संधि की समीक्षा की मांग कर रहा है।
  • 2025 के कश्मीर आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध पहले से ही बेहद नाजुक हैं।
  • जल विवाद का सीधा असर दक्षिण एशिया की कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।

नई दिल्ली/इस्लामाबाद: दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर जल संकट का मुद्दा गरमा गया है। भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसने दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों में नई आग लगा दी है। यह विवाद केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संधि का महत्व

वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि ने सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के उपयोग के नियम निर्धारित किए थे। पिछले छह दशकों में भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध और राजनयिक संकट आए, लेकिन यह संधि एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती रही। हालांकि, बदलते वैश्विक परिवेश में अब इस संधि की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं।

विवाद के मुख्य कारण: भारत बनाम पाकिस्तान

भारत का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और ऊर्जा उत्पादन की बढ़ती जरूरतों के कारण संधि के मौजूदा प्रावधान अब पर्याप्त नहीं हैं। भारत संधि की समीक्षा और उसमें आवश्यक बदलावों की वकालत कर रहा है ताकि संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सके। दूसरी ओर, पाकिस्तान इसे अपनी जीवनरेखा मानता है। पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु नदी का पानी उसके कृषि क्षेत्र और पेयजल की आपूर्ति के लिए अनिवार्य है, और वह संधि में किसी भी प्रकार के एकतरफा बदलाव का कड़ा विरोध करता है।

कश्मीर संकट और बढ़ता सैन्य तनाव

यह जल विवाद उस समय और भी गंभीर हो गया है जब 2025 में कश्मीर में पर्यटकों पर हुए घातक हमले ने दोनों देशों के बीच संबंधों को लगभग शून्य पर ला दिया था। भारत ने इस हमले के लिए सीमा पार से संचालित आतंकी समूहों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। इस घटना के बाद सीमा पर सैन्य गतिविधियां तेज हुईं और दोनों पक्षों के बीच झड़पें हुईं, जिसके बाद एक अस्थाई युद्धविराम लागू किया गया।

भविष्य की चुनौतियां और विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल विवाद का समाधान तकनीकी वार्ताओं के माध्यम से नहीं निकाला गया, तो इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उपलब्धता और जल सुरक्षा पर पड़ेगा। क्षेत्रीय शांति बनाए रखने के लिए दोनों देशों को विवाद समाधान तंत्र का उपयोग करते हुए बातचीत की मेज पर वापस आना अनिवार्य है।