भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता किया, जिससे 2047 तक 100 GW नाभिकीय क्षमता हासिल करने की योजना तेज होगी। यह कदम ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु लक्ष्य और रणनीतिक साझेदारी को एक साथ सुदृढ़ करता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ऑस्ट्रेलिया भारत को शांति उद्देश्यों के लिए यूरेनियम आपूर्ति करेगा।
  • भारत 2047 तक 100 GW नाभिकीय क्षमता का लक्ष्य रखता है।
  • समझौता ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु प्रतिबद्धता और द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करता है।

भारत की ऊर्जा नीति ने दशकों से दो विरोधाभासी प्रश्नों का सामना किया: बढ़ती जनसंख्या को विश्वसनीय बिजली कैसे उपलब्ध कराएँ और साथ ही कोयला‑आधारित ऊर्जा पर निर्भरता को घटाएँ। इस दुविधा का एक प्रमुख समाधान अब दूरस्थ दक्षिण‑पश्चिमी महाद्वीप, ऑस्ट्रेलिया, से आता दिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक प्रशासनिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे 2015 के भारत‑ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग समझौते को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाएगा।

समझौते की मुख्य शर्तें

समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया भारत को शांति उद्देश्यों के लिए यूरेनियम निर्यात करेगा, जबकि सभी सामग्री अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में रहेगी। ऑस्ट्रेलिया विश्व के लगभग 28 % ज्ञात यूरेनियम का धनी स्रोत है, फिर भी वह स्वयं कोई परमाणु ऊर्जा संयंत्र नहीं चलाता। इस प्रकार, भारत को विश्वसनीय, किफायती और पर्यावरण‑अनुकूल ईंधन स्रोत मिल रहा है, जो कोयला‑आधारित उत्पादन को घटाने में मदद करेगा।

भारत का 2047 नाभिकीय लक्ष्य

नई दिल्ली ने 2047, यानी स्वतंत्रता की शताब्दी, तक 100 GW नाभिकीय क्षमता हासिल करने की महत्वाकांक्षी योजना घोषित की है। यह क्षमता लगभग 60 मिलियन घरों को निरंतर बिजली प्रदान कर सकती है। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा केवल 3 % राष्ट्रीय विद्युत उत्पादन में योगदान देती है, जबकि पिछले दशक में क्षमता दुगुनी हुई है। यूरेनियम की आपूर्ति में स्थिरता न आने के कारण इस गति में बाधा आई थी; अब ऑस्ट्रेलिया के साथ दीर्घकालिक समझौता इस अंतर को पाटेगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध

भारत ने 1968 के नॉन‑प्रोलिफेरेशन ट्रीटी (NPT) को अस्वीकार किया, क्योंकि वह मानता था कि यह समझौता केवल 1967 से पहले परमाणु हथियार विकसित करने वाले पाँच देशों को ही लाभ देता है। परिणामस्वरूप, कई दशकों तक भारत को वैश्विक यूरेनियम बाजार से बाहर रखा गया। 2008 में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) ने भारत को विशेष छूट दी, जिससे वह सिविल परमाणु व्यापार कर सका। 2015 में दो देशों के बीच प्रारंभिक सहयोग समझौता हुआ, परंतु ईंधन की वास्तविक आपूर्ति तभी संभव हुई जब IAEA की सुरक्षा गारंटी स्पष्ट हुई।

भविष्य की रणनीतिक प्रभाव

यूरेनियम समझौते के साथ-साथ भारत‑ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज (जैसे लिथियम, रेयर अर्थ) और अंतरिक्ष सहयोग को भी गहरा करने का संकल्प लिया है। यह साझेदारी न केवल ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाएगी, बल्कि दोनों देशों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रणनीतिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत के जलवायु लक्ष्य (2030 में 450 GW नवीकरणीय, 2047 में शून्य‑कार्बन) को तेज करेगा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में नई गतिशीलता जोड़ देगा।