नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित अफगान दूतावास में तालिबान राजनयिकों ने पहली बार 'विजय दिवस' की पांचवीं वर्षगांठ मनाई, जिसमें भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और कई देशों के राजनयिकों ने शिरकत की।
- तालिबान ने दिल्ली में पहली बार 'विजय दिवस' की पांचवीं वर्षगांठ मनाई।
- भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव आनंद प्रकाश के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ।
- रूस, चीन और ईरान जैसे देशों ने राजनयिक भेजे, लेकिन पाकिस्तान अनुपस्थित रहा।
- तालिबान के Chargé d'affaires मुफ्ती नूर अहमद नूर ने क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-अफगान संबंधों पर जोर दिया।
नई दिल्ली के डिप्लोमैटिक एन्क्लेव चाणक्यपुरी में स्थित अफगान दूतावास की शाम सोमवार को बेहद खास रही। रोशनी से सजे लॉन और पारंपरिक पकवानों के बीच तालिबान राजनयिकों ने पहली बार अपने नियंत्रण के पांच साल पूरे होने पर 'विजय दिवस' का आयोजन किया। यह आयोजन भारत के राजनयिक इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है, क्योंकि भारत ने अभी तक आधिकारिक तौर पर तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी है।
इस कार्यक्रम की मेजबानी मुफ्ती नूर अहमद नूर (Chargé d'affaires) ने की। आयोजन में भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से संयुक्त सचिव (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान) आनंद प्रकाश के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल मौजूद था। इसके अलावा, फिलिस्तीन, ईरान, रूस और चीन जैसे देशों के राजनयिकों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि, पाकिस्तान की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही, जिसके साथ पिछले कुछ वर्षों में तालिबान के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, इस कार्यक्रम में भारतीय अधिकारियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारत 'प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी' (व्यावहारिक कूटनीति) अपना रहा है। बिना आधिकारिक मान्यता दिए भी, भारत अफगानिस्तान में अपने हितों की रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तालिबान के साथ कामकाजी संबंध (Working Relationship) बनाए रखना चाहता है। यह कदम दक्षिण एशिया में आतंकवाद को रोकने और कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से आवश्यक है।
तालिबान का दिल्ली में यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी वैधता प्राप्त करने की दिशा में एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है।
अपने 21 मिनट के संबोधन में मुफ्ती नूर अहमद नूर ने शरिया कानून के कार्यान्वयन और देश में स्थिरता का दावा किया। उन्होंने कहा कि एक स्थिर अफगानिस्तान न केवल अफगानों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए अनिवार्य है। उन्होंने भारत और अफगानिस्तान के सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों का उल्लेख करते हुए इसे भविष्य के सहयोग का आधार बताया।
कार्यक्रम के दौरान एक दिलचस्प विरोधाभास भी देखा गया। जहाँ तालिबान द्वारा नियुक्त राजनयिक मेहमानों के साथ डिनर कर रहे थे, वहीं पूर्व अशरफ गनी शासन के राजनयिक लॉन के किनारे खड़े होकर यह सब देख रहे थे। हालांकि, तालिबान राजनयिकों ने दावा किया कि उनके बीच कोई विवाद नहीं है और सभी मिलकर काम कर रहे हैं।
| श्रेणी | उपस्थिति/स्थिति |
|---|---|
| प्रमुख उपस्थित देश | रूस, चीन, ईरान, फिलिस्तीन, सर्बिया |
| अनुपस्थित देश | पाकिस्तान |
| भारतीय प्रतिनिधित्व | संयुक्त सचिव (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान) |
| मान्यता की स्थिति | आधिकारिक मान्यता नहीं, केवल कामकाजी संबंध |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या भारत ने तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता दे दी है?
नहीं, भारत ने अभी तक तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन वह व्यावहारिक संबंधों के लिए दूतावास में राजनयिक संपर्क बनाए हुए है।
प्रश्न 2: कार्यक्रम में कौन से प्रमुख विदेशी राजदूत शामिल हुए?
फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश और ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली प्रमुख रूप से शामिल थे।