काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के पांच साल बाद, भारत का रुख 'सावधानीपूर्वक जुड़ाव' की ओर मुड़ गया है। जानिए क्यों भारत बिना आधिकारिक मान्यता दिए भी तालिबान के साथ संबंध बढ़ा रहा है।
- भारत ने तालिबान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ा दिया है।
- अफगानिस्तान में भारत के $2-3 बिलियन के निवेश को सुरक्षित रखना एक मुख्य प्राथमिकता है।
- चीन और पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत का यह कदम रणनीतिक है।
अगस्त 2021 में जब काबुल का पतन हुआ, तब भारत ने आनन-फानन में अपने दूतावास को खाली कर दिया था। लेकिन पांच साल बाद, तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। नई दिल्ली में स्थित अफगानिस्तान दूतावास में हाल ही में आयोजित 'विजय दिवस' समारोह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब तालिबान शासन के साथ छाया से निकलकर सामने की कूटनीति की ओर बढ़ रहा है।
भारतीय अधिकारियों ने इस रुख को "सावधानीपूर्वक जुड़ाव" (Cautious Engagement) करार दिया है, जबकि आलोचक इसे अवसरवादी मान रहे हैं। भारत का यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक भी है। भारत ने अफगानिस्तान के विकास के लिए वर्षों तक अरबों डॉलर का निवेश किया है, और अब उस निवेश को पूरी तरह डूबने से बचाना सरकार की प्राथमिकता बन गया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि भारत की यह नीति 'ग्रेट गेम' का हिस्सा है। एक तरफ चीन अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर नजर गड़ाए बैठा है, तो दूसरी तरफ रूस भी तालिबान के साथ संबंध बना चुका है। भारत के लिए, तालिबान के साथ संवाद बनाए रखना चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो गया है।
भारत की रणनीति तालिबान शासन को मान्यता देने के बारे में नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों के साथ अपने संबंधों और हितों को सुरक्षित रखने के बारे में है।
सुरक्षा के मोर्चे पर, भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या अफगानिस्तान की धरती का उपयोग भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जाएगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्टों ने अल-कायदा और ISIL-K जैसे समूहों के खतरों की पुष्टि की है, लेकिन राहत की बात यह है कि लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों का उल्लेख नहीं है।
तालिबान के चार्ज डी'अफेयर्स, मुफ्ती नूर अहमद नूर, की भारत में बढ़ती उपस्थिति—चाहे वह राष्ट्रपति भवन का कार्यक्रम हो या राजनयिक समारोह—यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
Historical Background
2001 में तालिबान के पतन के बाद, भारत ने अफगानिस्तान के बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भारी निवेश किया था। 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद बनी राजनीतिक शून्यता ने भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
Frequently Asked Questions
1. क्या भारत ने तालिबान को आधिकारिक मान्यता दी है?
नहीं, भारत ने अभी तक तालिबान शासन को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है, लेकिन वह व्यावहारिक स्तर पर संवाद कर रहा है।
2. भारत के अफगानिस्तान में निवेश का क्या होगा?
भारत अपने $2-3 बिलियन के निवेश को सुरक्षित करने और अफगानिस्तान के लोगों के साथ अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए तालिबान के साथ जुड़ाव बढ़ा रहा है।