विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हालिया रक्षा सहयोग को खारिज करते हुए इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इन देशों की मौजूदा आंतरिक सैन्य स्थितियों का हवाला देते हुए समझौते को केवल प्रतीकात्मक बताया है।
- एस जयशंकर ने पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी रक्षा गठबंधन को प्रभावहीन बताया।
- इन देशों की आंतरिक सैन्य और राजनीतिक अस्थिरता समझौते की क्षमता पर सवाल उठाती है।
- भारत के खाड़ी देशों के साथ मजबूत होते रणनीतिक संबंध इस गठबंधन के प्रभाव को कम करते हैं।
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हाल ही में चर्चा में आए रक्षा सहयोग को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। एक महत्वपूर्ण राजनयिक चर्चा के दौरान, जयशंकर ने इस नए रक्षा अक्ष (axis) की वास्तविक शक्ति पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि इन देशों के बीच सैन्य सहयोग का क्या महत्व है, जबकि ये देश स्वयं गंभीर आंतरिक सैन्य और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
जयशंकर के अनुसार, केवल कागजी समझौतों से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण नहीं बदलते। उन्होंने संकेत दिया कि पाकिस्तान की आर्थिक और सुरक्षा स्थिति, तुर्की की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और सऊदी अरब के बदलते रणनीतिक रुख के बीच, यह गठबंधन व्यावहारिक सैन्य क्षमता की तुलना में अधिक प्रतीकात्मक प्रतीत होता है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह बयान केवल एक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि भारत की मजबूत कूटनीतिक स्थिति का प्रतिबिंब है। भारत ने पिछले दशक में खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई के साथ अपने संबंधों को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। यह नया गठबंधन भारत के बढ़ते प्रभाव और खाड़ी क्षेत्र में उसके गहरे रणनीतिक निवेश के सामने कमजोर नजर आता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना ठोस सैन्य समन्वय और आर्थिक स्थिरता के, ऐसे त्रिपक्षीय समझौते केवल राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाते हैं।
क्षेत्रीय विशेषज्ञों ने भी इस बात की ओर इशारा किया है कि पाकिस्तान की वर्तमान अस्थिरता इस गठबंधन की विश्वसनीयता को कम करती है। यदि कोई गठबंधन अपने सदस्यों की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो वह तीसरे पक्ष के साथ मिलकर क्षेत्रीय संतुलन बदलने में सक्षम नहीं होगा।
ऐतिहासिक रूप से, दक्षिण एशिया में सुरक्षा समीकरण हमेशा से शक्ति संतुलन पर आधारित रहे हैं। पाकिस्तान द्वारा तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर एक 'इस्लामिक सैन्य ब्लॉक' बनाने की कोशिश भारत के लिए एक चुनौती हो सकती है, लेकिन भारत की 'एक्ट ईस्ट' और 'लिंक वेस्ट' नीतियों ने इस खतरे को काफी हद तक बेअसर कर दिया है।
Frequently Asked Questions
1. क्या यह समझौता भारत के लिए खतरा है?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के मजबूत द्विपक्षीय संबंध सऊदी अरब के साथ होने के कारण यह गठबंधन भारत की सुरक्षा के लिए तत्काल खतरा नहीं है।
2. एस जयशंकर ने इस पर क्या टिप्पणी की?
जयशंकर ने सवाल उठाया कि इन देशों की मौजूदा सैन्य स्थितियों को देखते हुए यह समझौता वास्तव में क्या हासिल कर सकता है?