जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को सीधी चेतावनी देते हुए 1971 में भारत के सामने हुए ऐतिहासिक आत्मसमर्पण की याद दिलाई है। रहमान ने देश के राजनीतिक और विधायी मामलों में सेना के बढ़ते हस्तक्षेप की तीखी आलोचना की है।
- मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को 1971 के आत्मसमर्पण की याद दिलाई।
- JUI-F प्रमुख ने देश की राजनीति और कानून बनाने की प्रक्रिया में सैन्य हस्तक्षेप की कड़े शब्दों में निंदा की।
- उन्होंने पाकिस्तान में इस असंतुलन के लिए एक मजबूत और एकजुट विपक्ष की कमी को जिम्मेदार ठहराया।
एक बेहद आक्रामक और तीखे भाषण में, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख (COAS) जनरल आसिम मुनीर को सीधी चेतावनी दी है। रहमान ने सेना के असीमित अधिकारों पर सवाल उठाते हुए उन्हें 1971 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम की याद दिलाई, जब पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान अलग हो गया और बांग्लादेश का जन्म हुआ।
रहमान के इस बयान ने पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। पाकिस्तान में सेना की आलोचना करना और विशेष रूप से 1971 की हार का जिक्र करना एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक निषेध (Taboo) माना जाता है। रहमान का यह बयान उस समय आया है जब देश में सत्ताधारी गठबंधन सेना के समर्थन से बिना किसी मजबूत विपक्ष के लगातार नए कानून पारित कर रहा है।
ऐतिहासिक रूप से, पाकिस्तानी सेना खुद को देश के अंतिम रक्षक के रूप में पेश करती रही है और अक्सर नागरिक सरकार के नियंत्रण से बाहर काम करती है। लेकिन रहमान द्वारा 1971 के आत्मसमर्पण का जिक्र करना सेना की इस अजेय छवि को सीधे चुनौती देता है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी ने ढाका में आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद 93,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को भारतीय सेना ने युद्धबंदी बना लिया था।
फजलुर रहमान ने पाकिस्तान में मौजूदा विपक्ष की स्थिति पर भी दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एक मजबूत और संयुक्त विपक्ष की कमी के कारण ही सरकार संसद में सेना के अनुकूल कानूनों को बिना किसी जांच-परख के आसानी से पास करा पा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक वर्ग ने अपनी विधायी संप्रभुता को सैन्य शक्ति के सामने पूरी तरह समर्पित कर दिया है।
यह क्यों मायने रखता है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि फजलुर रहमान की यह सार्वजनिक बगावत पाकिस्तान के पारंपरिक राजनीतिक अभिजात वर्ग के भीतर बढ़ते असंतोष को दर्शाती है। जैसे-जैसे देश का आर्थिक संकट गहरा रहा है, अनुभवी राजनेता सैन्य वर्चस्व के खिलाफ खुद को स्थापित करने के लिए स्थापित सीमाओं को लांघने के लिए तैयार हो रहे हैं। यह दर्शाता है कि सेना का राजनीतिक नियंत्रण अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं रह गया है।
“1971 के इतिहास को दोहराकर फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी राजनीति की उस लक्ष्मण रेखा को पार कर दिया है, जो सेना की सर्वोच्चता को चुनौती देने से रोकती है। यह नागरिक-सैन्य संबंधों में बढ़ते तनाव का स्पष्ट संकेत है।”
नागरिक सरकार और सैन्य कमान के बीच यह तनाव आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है, क्योंकि इमरान खान की पार्टी पीटीआई सहित अन्य राजनीतिक दल भी शासन में सेना की भूमिका को लगातार चुनौती दे रहे हैं। 1971 का संदर्भ यह याद दिलाता है कि जब आंतरिक राजनीतिक दमन राष्ट्रीय एकता पर हावी हो जाता है, तो देश को कितने गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
| विशेषता | 1971 का संकट | वर्तमान राजनीतिक संकट (2024) |
|---|---|---|
| मुख्य कारण | भौगोलिक विभाजन, आर्थिक शोषण और लोकतांत्रिक जनादेश को खारिज करना। | गंभीर आर्थिक अस्थिरता, नागरिक-सैन्य सत्ता संघर्ष और विवादित चुनाव। |
| सेना की भूमिका | पूर्वी पाकिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई और राजनीतिक दमन। | अप्रत्यक्ष राजनीतिक इंजीनियरिंग, हाइब्रिड शासन नियंत्रण और न्यायिक हस्तक्षेप। |
| बाहरी कारक | भारत द्वारा प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप। | भू-राजनीतिक दबाव और आईएमएफ/विदेशी बेलआउट पर निर्भरता। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मौलाना फजलुर रहमान ने 1971 का जिक्र क्यों किया?
उत्तर 1: रहमान ने सैन्य नेतृत्व को यह याद दिलाने के लिए 1971 का जिक्र किया कि अत्यधिक राजनीतिक दमन और असीमित शक्ति अंततः देश के विभाजन का कारण बन सकती है, जैसा कि पाकिस्तान की ऐतिहासिक हार के दौरान हुआ था।
प्रश्न 2: जनरल आसिम मुनीर कौन हैं?
उत्तर 2: जनरल आसिम मुनीर पाकिस्तान के वर्तमान सेना प्रमुख (COAS) हैं, जिन्हें देश की हाइब्रिड राजनीतिक व्यवस्था में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता है।