आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए उन्हें अपनी 'कर्मभूमि' के प्रति वफादार रहने और विविधता का सम्मान करने का आह्वान किया। उन्होंने भारत और अमेरिका दोनों के 'विविधता में एकता' के सिद्धांतों पर जोर दिया।
- मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया।
- उन्होंने 'कर्मभूमि' (कार्यस्थल) के प्रति कर्तव्य और 'जन्मभूमि' (भारत) के प्रति मूल्यों के पालन पर जोर दिया।
- भागवत ने कहा कि विविधता और एकता दोनों भारत और अमेरिका के डीएनए में शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क में एक महत्वपूर्ण संबोधन में भारतीय प्रवासियों को एक गहरा संदेश दिया। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इन्फोसिस थिएटर में आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' के दौरान, उन्होंने 6,000 से अधिक भारतीय-अमेरिकी समुदाय के सदस्यों और अंतरधार्मिक नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रवासियों को अपनी 'कर्मभूमि' के प्रति पूरी तरह वफादार रहना चाहिए।
भागवत ने स्पष्ट किया कि जो लोग अमेरिका में रह रहे हैं, वे वहां से कमाते हैं और वहां के समाज का हिस्सा हैं, इसलिए उनका प्राथमिक कर्तव्य उस समाज के प्रति ईमानदार रहना है। उन्होंने कहा, "हम अमेरिका में हैं, हम अमेरिका में रहते हैं, हम अमेरिका में कमाते हैं और हमें अमेरिका के प्रति सच्चा व्यवहार करना चाहिए।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि भारत उनकी जन्मभूमि है, लेकिन कर्मभूमि के प्रति कर्तव्य निभाना अनिवार्य है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मोहन भागवत का यह बयान वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रवासियों की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास है। यह न केवल सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की बात करता है, बल्कि मेजबान राष्ट्र के प्रति नागरिक कर्तव्यों को भी रेखांकित करता है। यह संदेश प्रवासी समुदायों के भीतर 'दोहरी पहचान' के संतुलन को सुदृढ़ करने के लिए दिया गया है।
विविधता केवल सहिष्णुता का विषय नहीं है, बल्कि यह उस एकता को सजाने वाला तत्व है जो भारत और अमेरिका दोनों के मूल में है।
अपने भाषण के दौरान, भागवत ने 'विविधता में एकता' के दर्शन को विस्तार देते हुए कहा कि यह विचार भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों के डीएनए में रचा-बसा है। उन्होंने कहा कि विविधता का जश्न मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में 'एकता' की भावना को कभी नहीं खोना चाहिए।
ऐतिहासिक संदर्भ
भारतीय प्रवासियों का वैश्विक प्रभाव पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ा है। अमेरिका में भारतीय समुदाय तकनीकी, चिकित्सा और व्यापारिक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। ऐसे में, आरएसएस प्रमुख का यह संबोधन प्रवासियों को उनकी जड़ों से जोड़े रखते हुए उन्हें वैश्विक नागरिक के रूप में जिम्मेदार बनाने की एक रणनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
Frequently Asked Questions
1. मोहन भागवत ने 'कर्मभूमि' से क्या तात्पर्य बताया?
भागवत के अनुसार, कर्मभूमि वह स्थान है जहां व्यक्ति काम करता है और जीविकोपार्जन करता है, और उस स्थान के प्रति निष्ठावान रहना उसका नैतिक कर्तव्य है।
2. इस कार्यक्रम का आयोजन किसने किया था?
इस कार्यक्रम का आयोजन 'अमेरिकन हिंडुओं फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग' (AHEAD) नामक गैर-लाभकारी संस्था द्वारा किया गया था।