ग्लेशियर टूटने से नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 675 लोगों की जान जा चुकी है। रेस्क्यू टीमें मलबे और कीचड़ के बीच हजारों लापता लोगों की तलाश में जुटी हैं।
- ग्लेशियर टूटने से आई अचानक बाढ़ ने नेपाल के कई जिलों में तबाही मचाई।
- मृतकों की संख्या 675 तक पहुंच गई है और 3,000 से अधिक लोग लापता हैं।
- भारत ने 68.5 टन राहत सामग्री और तकनीकी सहायता भेजी है।
- अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना की सुरंगों में कई लोग फंसे होने की आशंका है।
नेपाल में प्रकृति का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। बुधवार को एक ग्लेशियर के ढहने के बाद आई अचानक बाढ़ (flash floods) ने पहाड़ों की नदियों में चट्टानों, बर्फ और कीचड़ का ऐसा सैलाब भेजा जिसने पुलों, इमारतों और बिजली स्टेशनों को तहस-नहस कर दिया। शनिवार को रेस्क्यू ऑपरेशन फिर से शुरू हुआ, लेकिन भारी बारिश और कोहरे ने बचाव कार्यों में बड़ी बाधा उत्पन्न की है।
तबाही का केंद्र और लापता लोग
सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग और चितवन हैं। तिब्बत सीमा के पास स्थित इन इलाकों में रेस्क्यू टीमें मलबे को हटाकर जीवित बचे लोगों की तलाश कर रही हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 3,000 से अधिक लोग लापता हैं, जिनमें 275 से अधिक भारतीय शामिल हैं। अब तक 3,700 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जिनमें 108 भारतीय शामिल हैं।
क्यों यह संकट गहरा है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि नेपाल की भौगोलिक स्थिति और बुनियादी ढांचे की कमजोरी इस आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है। दुर्गम पहाड़ी इलाका, टूटी हुई सड़कें और नदियों का बढ़ता जलस्तर बचाव कार्यों को लगभग असंभव बना रहा है। विशेष रूप से अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना की सुरंगों में 100 से अधिक श्रमिकों के फंसे होने की आशंका ने चिंता को और बढ़ा दिया है।
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और अचानक आने वाली बाढ़ हिमालयी देशों के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बन गई है।
भारत की भूमिका और सहायता: भारत सरकार ने इस संकट की घड़ी में नेपाल की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि भारत अब तक 68.5 टन राहत सामग्री एयरलिफ्ट कर चुका है। इसमें तकनीकी टीमें, चिकित्सा उपकरण, और पुल बनाने के लिए आवश्यक सामग्री शामिल है। भारतीय वायु सेना के C-130 विमानों ने विशेष बचाव दल और डीएनए विश्लेषण उपकरण भी भेजे हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीक
नेपाल सरकार ने सुरंगों से लोगों को निकालने और पहचान के लिए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मांग की है। चीन ने भी अपने टनल विशेषज्ञ भेजे हैं। वहीं, एलन मस्क की कंपनी Starlink ने संकट के समय संचार व्यवस्था बहाल करने के लिए मुफ्त सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं प्रदान करने की पेशकश की है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: नेपाल में सबसे ज्यादा प्रभावित जिले कौन से हैं?
उत्तर: रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग और चितवन सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र हैं।
प्रश्न 2: भारत ने अब तक कितनी सहायता भेजी है?
उत्तर: भारत ने अब तक 68.5 टन राहत सामग्री, तकनीकी टीमें और ब्रिज निर्माण के उपकरण भेजे हैं।