अमेरिकी प्रतिबंधों की छूट समाप्त होने के बाद, भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए रणनीतिक विकल्पों, जिसमें हिस्सेदारी का अस्थायी हस्तांतरण शामिल है, पर विचार कर रहा है।
- भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चाबहार बंदरगाह में संचालन जारी रखने के लिए 'टिकाऊ रास्ता' खोज रहा है।
- नई दिल्ली अमेरिकी दंड से बचने के लिए परियोजना में अपनी हिस्सेदारी अस्थायी रूप से किसी ईरानी इकाई को हस्तांतरित करने पर विचार कर रही है।
- यह बंदरगाह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- 2020 से 2025 के बीच बंदरगाह पर कार्गो आवाजाही में 82% से अधिक की वृद्धि हुई है।
भारत वर्तमान में एक जटिल राजनयिक चुनौती का सामना कर रहा है, जहाँ वह ईरान के रणनीतिक चाबहार बंदरगाह में अपनी भागीदारी बनाए रखने के लिए एक "टिकाऊ रास्ता" तलाश रहा है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बिश्केक में कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के बावजूद, भारत इस महत्वपूर्ण सहयोग को जारी रखने के लिए विभिन्न हितधारकों के साथ निरंतर संपर्क में है।
यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंधों की छूट समाप्त हो गई, जिससे भारत का 120 मिलियन डॉलर का निवेश खतरे में पड़ गया। रिपोर्टों के अनुसार, नई दिल्ली एक परिष्कृत कदम उठाने पर विचार कर रही है: परियोजना में अपनी हिस्सेदारी अस्थायी रूप से किसी ईरानी इकाई को सौंप देना। यह कदम सैद्धांतिक रूप से भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों के सीधे प्रभाव से बचाएगा और भविष्य में प्रतिबंध हटने पर वापसी का रास्ता खुला रखेगा।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि चाबहार केवल एक व्यावसायिक उद्यम नहीं बल्कि एक भू-राजनीतिक आवश्यकता है। भारत के लिए, यह बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का एकमात्र व्यवहार्य विकल्प है, क्योंकि पाकिस्तान भारत को अपने क्षेत्र से पारगमन (transit) की अनुमति नहीं देता है। इसके अलावा, चाबहार चीन के प्रभाव को संतुलित करने का एक जरिया है, खासकर चीन समर्थित ग्वादर बंदरगाह के संदर्भ में, जो यहाँ से मात्र 170 किमी दूर है।
चाबहार के लिए संघर्ष भारत की एक बड़ी चुनौती का सूक्ष्म रूप है: ग्लोबल साउथ में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका के साथ अपनी महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदारी के बीच संतुलन बनाना।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रणनीतिक गहराई
चाबहार के साथ भारत का जुड़ाव दो दशकों से अधिक पुराना है, जिसकी शुरुआत 2003 में हुई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2016 की ईरान यात्रा के दौरान इस परियोजना को नई गति मिली। 2024 तक, इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ने शाहिद बेहश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए।
क्षेत्रीय पहुंच के अलावा, यह बंदरगाह अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह मल्टीमॉडल नेटवर्क भारत को ईरान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ता है, जिससे स्वेज नहर के पारंपरिक मार्ग की तुलना में समय और लागत में भारी कमी आती है।
| विशेषता | चाबहार बंदरगाह (भारत) | ग्वादर बंदरगाह (चीन) |
|---|---|---|
| प्राथमिक लक्ष्य | मध्य एशिया/अफगानिस्तान पहुंच | CPEC/हिंद महासागर पहुंच |
| रणनीतिक मूल्य | पाकिस्तान को दरकिनार करना | पश्चिमी चीन से सीधा लिंक |
| कनेक्टिविटी | INSTC नेटवर्क | बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) |
बंदरगाह की आर्थिक व्यवहार्यता पहले ही स्पष्ट हो चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कार्गो हैंडलिंग 2020-21 में 12.24 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 22.32 लाख टन हो गई है—जो 82% से अधिक की वृद्धि है। अब पीछे हटने का मतलब होगा दो दशकों के राजनयिक और वित्तीय निवेश को त्यागना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज क्यों नहीं कर सकता?
अमेरिका के साथ भारत के गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं; प्रतिबंधों का उल्लंघन करने से रक्षा आयात या वित्तीय व्यापार जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
प्रश्न 2: INSTC की क्या भूमिका है?
अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा एक व्यापार नेटवर्क है जो ईरान के माध्यम से भारत को रूस और यूरोप से जोड़ता है, जो समुद्री मार्गों का एक तेज़ विकल्प प्रदान करता है।