नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने जलविद्युत परियोजनाओं के 933 कर्मचारियों को लापता कर दिया है। सैकड़ों लोगों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है, जबकि भारत और चीन की टीमें बचाव कार्य में जुटी हैं।

  • बाढ़ के बाद जलविद्युत परियोजनाओं के 933 कर्मचारी अभी भी लापता या संपर्क से बाहर हैं।
  • 600 से अधिक लोगों के सुरंगों के अंदर फंसे होने की आशंका है, जबकि 279 को बचाया जा चुका है।
  • भारत और चीन की विशेषज्ञ टीमों ने नेपाली सेना के साथ बचाव कार्य में हाथ मिलाया है।
  • यह आपदा नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के खिसकने (हिमस्खलन) के कारण आई।

नेपाल के उत्तरी और मध्य क्षेत्र वर्तमान में अपने इतिहास की सबसे भीषण जल आपदाओं में से एक का सामना कर रहे हैं। 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के बाद, राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण ने पुष्टि की है कि विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं के 933 कर्मचारी अभी भी लापता हैं। इस त्रासदी की गंभीरता इस बात से पता चलती है कि बड़ी संख्या में कर्मचारी गहरी सुरंगों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में काम कर रहे थे जब यह तबाही आई।

माना जा रहा है कि यह आपदा नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के एक बड़े हिस्से के ढहने से शुरू हुई। इसके परिणामस्वरूप भोटकोशी नदी में पानी का एक विशाल सैलाब उमड़ पड़ा, जिसने रास्ते में आने वाले घरों, पुलों और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया। पानी का वेग इतना तीव्र था कि उसने कुछ ही सेकंड में प्रोजेक्ट ऑफिस और कैंपों को बहा दिया, जिससे सैकड़ों कर्मचारी भूमिगत रास्तों में फंस गए।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह आपदा हिमालयी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की अत्यधिक संवेदनशीलता को उजागर करती है। जैसे-जैसे नेपाल अपनी जल संसाधनों का उपयोग कर जलविद्युत क्षमता बढ़ा रहा है, ग्लेशियर फटने (GLOF) और भूस्खलन से होने वाली बाढ़ मानव जीवन और आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।

जीवित बचे लोगों के विवरण रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। रसुवा के मैलुंग जलविद्युत परियोजना में तकनीकी कर्मचारी शिव गिरि ने बताया कि कैसे उन्होंने बाढ़ से बचने के लिए 12 घंटे जंगलों में trek किया और रात एक गुफा में बिताई। इसी तरह, अपर त्रिशुली-1 परियोजना के सिविल इंजीनियर संदीप राणा ने देखा कि कैसे उनके ऑफिस और कैंप आंखों के सामने पानी में समा गए, और वे केवल ऊंचाई पर चढ़कर अपनी जान बचाने में सफल रहे।

हिमालय में जलवायु परिवर्तन और बुनियादी ढांचे का विकास एक 'खतरे वाले क्षेत्र' का निर्माण कर रहा है, जहाँ पारंपरिक इंजीनियरिंग चरम मौसम की घटनाओं के सामने अपर्याप्त साबित हो रही है।

बचाव कार्य का मुख्य केंद्र नुवाकोट में अपर त्रिशुली-3A जलविद्युत परियोजना है। नेपाली सेना भारी मशीनरी और नियंत्रित विस्फोटों (blasting) का उपयोग करके एक दबी हुई सुरंग को खोलने की कोशिश कर रही है। 90 सदस्यीय संयुक्त बचाव दल तैनात है, लेकिन अभी तक सुरंग के अंदर फंसे लोगों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। मलबे को हटाने के लिए बुलडोजर और उत्खनन मशीनों को एयरलिफ्ट कर मौके पर पहुँचाया गया है।

एक अन्य उत्तरजीवी रामचन्द्र ने बताया कि कैसे वे और उनके पांच साथी त्रिशुली नदी की एक सुरंग में फंसे थे और पानी के तेज बहाव से बचने के लिए छह घंटे तक छत पर लगी लोहे की सीढ़ी को पकड़े रहे। यह घटना दर्शाती है कि ऐसी आपदाओं के दौरान सुरंगों के भीतर स्थिति कितनी भयानक होती है।

क्या आप जानते हैं?: हिमालय में हजारों ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से कई अस्थिर हैं और बिना किसी चेतावनी के निचले इलाकों में अचानक भीषण बाढ़ ला सकती हैं।
परियोजना स्थल मुख्य प्रभाव वर्तमान स्थिति
मैलुंग प्रोजेक्ट बुनियादी ढांचा बहा गया जीवित बचे लोगों को हेलीकॉप्टर से निकाला गया
अपर त्रिशुली-1 ऑफिस और कैंप नष्ट कर्मचारी पहाड़ी पर चढ़कर बचे
अपर त्रिशुली-3A सुरंग मलबे में दबी सक्रिय ब्लास्टिंग और बचाव कार्य जारी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: वर्तमान में कितने लोग लापता हैं?
उत्तर: लगभग 933 जलविद्युत कर्मचारी लापता हैं, जिनमें से 600 से अधिक के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है।

प्रश्न 2: बचाव कार्य में नेपाल की मदद कौन कर रहा है?
उत्तर: भारत और चीन की विशेषज्ञ टीमों ने नेपाली सेना के साथ मिलकर खोज और बचाव अभियान चलाया है।