नेपाल के विदेश मंत्री द्वारा जलवायु मुआवजे की मांग के जवाब में भारत ने स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन एक साझा वैश्विक चुनौती है और विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने और वित्त पोषण में नेतृत्व करना चाहिए।

  • नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका से जलवायु मुआवजे की मांग की है।
  • भारत ने कहा कि विकसित देशों को उत्सर्जन कटौती और तकनीक हस्तांतरण में आगे आना चाहिए।
  • नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में 1,200 से अधिक लोगों की मौत हो गई है।
  • भारत ने नेपाल के पुनर्निर्माण और राहत कार्यों में निरंतर सहयोग का आश्वासन दिया है।

नई दिल्ली: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल द्वारा प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों से जलवायु-संबंधित मुआवजे की मांग के बाद, भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने शुक्रवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन एक साझा चुनौती है और इस दिशा में कार्रवाई 'साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं' (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत ने नेपाल सरकार और वहां के लोगों को भीषण बाढ़ के बाद तत्काल सहायता प्रदान की है। उन्होंने जोर देकर कहा, "एक करीबी मित्र और भागीदार के रूप में, भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी है और देश के पुनर्निर्माण और रिकवरी प्रयासों में सहयोग जारी रखेगा।"

नेपाल की मांग और विवाद का कारण

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने 'काठमांडू पोस्ट' को दिए एक साक्षात्कार में तर्क दिया कि जलवायु मुआवजे की सहायता कोई दान नहीं, बल्कि एक कानूनी और नैतिक दायित्व है। उन्होंने भारत, चीन और अमेरिका को इस जिम्मेदारी के लिए जिम्मेदार ठहराया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, ये तीन देश मिलकर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 45 से 48 प्रतिशत हिस्सा साझा करते हैं।

गौरतलब है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है, जो वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 7 से 8 प्रतिशत का योगदान देता है। नेपाल के अनुसार, इन बड़े उत्सर्जकों को जलवायु-संवेदनशील देशों की मदद करनी चाहिए।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद वैश्विक जलवायु न्याय (Climate Justice) की बहस को एक नया मोड़ दे रहा है। दक्षिण एशियाई राजनीति में, जहां भारत और नेपाल के संबंध गहरे हैं, मुआवजे की यह मांग कूटनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकती है। यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जिम्मेदारी और वैश्विक उत्सर्जन मानकों का है।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों को केवल सलाह नहीं, बल्कि वास्तविक वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करनी होगी।

अगस्त के अंत में, नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में एक ग्लेशियर के ढहने के कारण आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई थी। इस आपदा में 1,259 लोगों की जान चली गई और लगभग 5,000 लोग लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ का पानी ल्हेंडे खोला, भोटेकोषी और त्रिशूली नदी घाटियों में भारी मात्रा में मलबे के साथ बह गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ग्लेशियरों का पिघलना और अचानक आने वाली बाढ़ (GLOF) हिमालयी देशों के लिए एक निरंतर खतरा बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे नेपाल जैसे देशों में जल विज्ञान संबंधी आपदाओं का खतरा बढ़ गया है।

Did You Know?: हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना दुनिया के कई नदी तंत्रों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रहा है।

Frequently Asked Questions

1. नेपाल ने किन देशों से मुआवजे की मांग की है?
नेपाल ने मुख्य रूप से भारत, चीन और अमेरिका से मुआवजे की मांग की है क्योंकि ये देश वैश्विक उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

2. भारत का इस मुद्दे पर क्या आधिकारिक रुख है?
भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन एक साझा चुनौती है और विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने और तकनीक प्रदान करने में नेतृत्व करना चाहिए।