अंतरराष्ट्रीय मूर्ति तस्कर सुभाष चंद्र कपूर की रिहाई और प्रत्यर्पण को लेकर केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच कानूनी गतिरोध पैदा हो गया है। जर्मनी द्वारा नए मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति न देने के बाद अब अमेरिका द्वारा प्रत्यर्पण की मांग ने पेचीदगियां बढ़ा दी हैं।

  • सुभाष कपूर ने अपनी 10 साल की सजा मार्च 2023 में पूरी कर ली है।
  • तमिलनाडु सरकार पांच अन्य मूर्ति चोरी के मामलों में मुकदमा चलाने का समर्थन कर रही है।
  • जर्मनी ने 'विशेषता के सिद्धांत' (Rule of Speciality) के तहत नए मामलों में मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया है।
  • अमेरिका ने भी कपूर और अन्य पांच आरोपियों के प्रत्यर्पण की मांग की है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित मूर्ति तस्कर और कला डीलर सुभाष चंद्र कपूर की रिहाई अब एक जटिल अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद का केंद्र बन गई है। तिरुचि सेंट्रल जेल में बंद कपूर को लेकर केंद्र सरकार और तमिलनाडु राज्य सरकार के बीच एक गहरा गतिरोध उत्पन्न हो गया है। जहाँ केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय संधियों का सम्मान करने पर जोर दे रही है, वहीं तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि कपूर अभी भी कई अन्य चोरी के मामलों में आरोपी है।

मामले की पृष्ठभूमि

सुभाष कपूर, जो एक अमेरिकी नागरिक है, को 2012 में जर्मनी के कोलोन हवाई अड्डे से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। यह कार्रवाई 2008 में अरियालुर जिले के उदयरपलायम पुलिस द्वारा दर्ज किए गए एक मामले के तहत की गई थी, जिसमें ₹94 करोड़ से अधिक मूल्य की 19 प्राचीन मूर्तियों की चोरी और अवैध निर्यात का आरोप था। कपूर को कुंभकोणम की अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया और 10 साल की सजा सुनाई गई, जिसे उन्होंने 22 मार्च 2023 को पूरा कर लिया।

सजा पूरी होने के बावजूद, कपूर को तिरुचि सेंट्रल जेल में रखा गया क्योंकि विक्रमंगलम, वृद्धाचलम, पलवूर और वीरवनल्लूर पुलिस स्टेशनों में दर्ज चार अन्य मूर्ति चोरी के मामलों में उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक अपराधी की रिहाई का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण संधियों की व्याख्या का है। यदि भारत जर्मनी के साथ अपनी संधियों का उल्लंघन करता है, तो भविष्य में अन्य देशों के साथ राजनयिक संबंधों और प्रत्यर्पण प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

प्रत्यर्पण संधियों में 'विशेषता का सिद्धांत' एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी बाधा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि जिस अपराध के लिए किसी को प्रत्यर्पित किया गया है, उसके अलावा अन्य अपराधों के लिए उसका उपयोग न किया जाए।

हाल ही में विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा अदालत में दायर हलफनामे में बताया गया कि जर्मनी ने दिसंबर 2023 में कपूर के खिलाफ नए मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके अतिरिक्त, अमेरिका ने भी 2021 में ही कपूर और पांच अन्य सह-आरोपियों के प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध किया था, क्योंकि वे अमेरिका में भी प्राचीन वस्तुओं की तस्करी में शामिल थे।

कानूनी पेच और संधियों का टकराव

भारत और जर्मनी के बीच प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 19 (विशेषता का नियम) के अनुसार, कपूर को अमेरिका को सौंपने से पहले भारत को जर्मनी की सहमति लेनी होगी। जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने अप्रैल 2026 में स्पष्ट किया कि 'विशेषता के सिद्धांत' के तहत आगे की कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जा सकती।

पक्षमुख्य तर्ककानूनी आधार
केंद्र सरकारजर्मनी और अमेरिका के साथ प्रत्यर्पण संधियों का सम्मान करना चाहिए।अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संबंध
तमिलनाडु सरकारकपूर पांच अन्य चोरी के मामलों में आरोपी है, उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए।राज्य पुलिस मामले (Idol Wing CID)

Idol Wing CID का दावा है कि कपूर एक विशाल वैश्विक तस्करी नेटवर्क का मास्टरमाइंड था जिसने तमिलनाडु के मंदिरों से हजारों प्राचीन मूर्तियों को लूटा। जांच अधिकारियों का कहना है कि अब तक केवल 56 में से 25 मूर्तियां ही वापस लाई जा सकी हैं, जबकि 19 मूर्तियां अभी भी लापता हैं।

Did You Know?: सुभाष कपूर के मामले में शामिल 56 मूर्तियों में से लगभग एक-तिहाई मूर्तियां अभी भी दुनिया के किसी कोने में छिपी हुई हैं और उनका पता नहीं चल पाया है।

Frequently Asked Questions

1. सुभाष कपूर को जेल में क्यों रखा गया है?
सजा पूरी होने के बावजूद, उन्हें तमिलनाडु में अन्य चार मूर्ति चोरी के मामलों में आरोपी होने के कारण हिरासत में रखा गया है।

2. 'विशेषता का नियम' क्या है?
यह अंतरराष्ट्रीय कानून का एक सिद्धांत है जो कहता है कि प्रत्यर्पित किए गए व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिनके लिए उसे प्रत्यर्पित किया गया था।